Tuesday, April 22, 2008

रीटा पणिक्कर के नाम एक खुला पत्र

04 फरवरी, 2008नई दिल्ली।
आदरणीया निदेशक ,
बटरफ्लाइज , यू -४, ग्रीनपार्क एक्सटेंशन , नई दिल्ली - 110016।
महोदया,
अपने ईमेल से भेजे गये पिछले चार पत्रों के समुचित जवाब और न्याय की उम्मीद करते हुए जितना लम्बा समय मैंने धैर्यपूर्वक इंतजार करते हुए बिताया है इस बात से आप और संगठन के सभी सदस्य भलीभाँति परिचित हैं। अपने साथ हुए भयावह दुर्व्यवहार के दोषी पी॰ एन॰ राय पर कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए पहला पत्र मैंने 24 अक्टूबर 2007 को भेजा था और उसके बाद क्रमशः 03 दिसम्बर, 06 दिसम्बर और 15 जनवरी 2008 को अन्य पत्र भेजे। न्याय की मेरी इस मांग के समर्थन में तथा पी॰ एन॰ राय को ऐसे आपराधिक कृत्य के लिये संगठन से बाहर निकालने की पुरजोर मांग करते हुए संगठन के 25 से अधिक सदस्यों ने आपको प्रतिवेदन दिया था। पूरे संगठन की भावना और मानव अधिकारों के साथ खिलवाड़ करते हुए आपने पी॰ एन॰ राय को बचाने में भूखे-नंगे, बेघर-बेसहारा बच्चों के नाम पर इकट्ठा किये गये पैसों को पानी की तरह बहाया। बेघर बच्चों को आश्रय देने के नाम पर बटोरी गई राशि कुछ जेबों में जाती रही और बच्चे भूख, मौसम और पुलिस की मार सहते हुए फुटपाथों पर दम तोड़ते रहे।
वैसे ये बातें आप जैसे बाल अधिकार का व्यवसाय करने वाले लोगों के लिये कुछ खास महत्व की नहीं हैं यह बात जगजाहिर ही है।अपने साथ हुए बर्बर दुर्व्यवहार की शिकायत करते हुए 24 अक्टूबर को आपके नाम भेजे गये मेरे पत्र की तारीख से लेकर अबतक करीब चार महीने गुजर चुके हैं और इस बीच आपने जो भी हथकंडे अपनाये हैं उनसे साबित हो चुका है कि आप पी॰ एन॰ राय पर कार्रवाई की मांग करने वाले संगठन के सभी सदस्यों को हर कीमत पर कुचल देना चाहती हैं। बर्बर कबीलाई आचरण में अब आपने पी॰ एन॰ राय को भी पीछे छोड़ दिया है। पूरे संगठन के कड़े विरोध के बावजूद अपने जरखरीद और ईमान की दुकानदारी करने वाले कुछ लोगों को जुटाकर आपने भानुमति का कुनबा जोड़ा और उसे जाँच कमिटि के नाम पर इस मामले को दबाने, कुचलने की खुली छूट दे दी। इस जाँच कमिटि के सदस्यों ने मेरे तथा कुछ अन्य सहकर्मियों के साथ जैसा बर्ताव किया उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है ये लोग किसी पुलिसिया एनकाउण्टर दल के लिये सबसे योग्य उम्मीदवार हो सकते हैं। मानवाधिकारों के इन बड़े और मँझे हुए खिलाडियों की सलाह से आपने सबसे पहले एक-एककर उन लोगों को संगठन से बाहर निकाला जो इस मामले के प्रत्यक्ष गवाह थे (मो॰ आजाद, सुनील, डॉक्टर प्रदीप, तेजपाल, सादिक, सुनील कुमार, अशरफ और मनोज) और किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार नहीं थे।शेष बचे सदस्यों को डराने, धमकाने और ब्लैकमेल करने में आपने कोई कसर नहीं छोड़ी। वर्तमान में भी साथी ऋषि और मोनिका को हर स्तर पर प्रताडि़त किया जा रहा है और यदि उन्होंने भी झुकना कबूल नहीं किया तो आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही उन्हें भी संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। आपके इस अभियान में प्रमुख भूमिका निभा रहे तीनों नुमाइंदे जावेद, सत्यवीर और पी॰एन॰राय जिनके कुकर्मों के बल पर आप अब तक बच्चों का कारोबार चलाती रही हैं और सड़क पर रहने वाले बेघर, बेसहारा बच्चों के बीच आतंक फैलाती रही हैं, पिछले चार महीनों से संगठन के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और बच्चों को डराने, धमकाने के साथ-साथ जान से मारने की धमकी देते फिर रहे हैं।
दरअसल प्रारम्भ में सरकार की आलोचना कर सहानुभूति बटोरने वाले और देशी-विदेशी धनकुबेरों तथा थैलीबाजों को झूठी तस्वीरें दिखाकर भ्रमित करने वाले आप जैसे लोग संगठन को अपनी जागीर समझते हैं और इसीलिये जबान खोलने वाले सहकमिर्यों (अथवा कर्मचारियों) को कुचलने में नीचता की सारी हदें लांघ जाते हैं। चूंकि आप जैसे लोग सोशल सेक्टर को पैसा बनाने का सबसे सुरक्षित जरिया मानते हैं इसलिये आपका सबसे बड़ा मूल्य पैसा है। आपके इस व्यवसाय में बाधा डालने वाले आपके लिये बड़े दुश्मन हैं। यह अकारण नहीं है कि सड़क के बच्चों को ड्रग्स की सप्लाई करने वाले, उन्हें भीख मांगने और देह व्यापार करने के लिये मजबूर करने वाले माफिया और ठेकेदार तथा पुलिस वाले जो छोटे-छोटे बच्चों को बेरहमी से मार-पीटकर उनसे ड्रग्स बिकवाते और उनका भयावह दैहिक मानसिक शोषण करते-करवाते हैं आपके अघोषित मित्र हैं जिनका विरोध करने की बजाय आप लोग उनसे गलबहियाँ डाले रहते हैं।
चार महीनों के अपने प्रशासनिक प्रहसन की अगली कड़ी में यह भी सम्भव है कि आप उस मुर्दा फर्जी जांच कमिटी को फ़िर से सामने ले आयें पर अब यह गुलाम कमिटी और आपके अपर्णा भट्टों एवं योगेश मेह्ताओं जैसे कारिंदे , जिनका सरोकार ही मानवाधिकारों का व्यवसाय कर पैसा बनाना है , भी आपके हित में कोई करिश्मा कर पाने में कामयाब नहीं हो सकेंगे। आपने अपने अपराधों की फेहरिस्त इतनी लम्बी कर ली है कि कोई भी साबुन उसे धो नहीं सकेगा।
आपका यह मानवविरोधी चरित्र उस तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टी (पीसीसी सीपीआई एमएल) के चरित्र को भी उजागर करता है जिसके स्वनामधन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रयास से बटरफ्लाइज की स्थापना हुई थी और आज भी जिसके कुछ नेता इस संगठन के सिपहसालार और संरक्षक बने हुए हैं। जाहिर है इसके एवज में उन्हें हर महीने एक मोटी रकम बतौर नजराने मिलती है। छिः यह पार्टी खुद को सर्वहारा का हितैषी कहती फिरती है। इस देश का इससे बढ़कर दुर्भाग्य भला और क्या हो सकता है ?
कुछ और भी संगठन जिनमें पीयूडीआर (पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स) आदि शामिल हैं, का मानवतावादी नकाब उतारने में इस घटना ने बड़ी भूमिका निभाई है। बटरफ्लाइज निदेशक के काले कारनामों की शिकायत लेकर जब संगठन के दर्जनों सदस्य इस संगठन के पास गये और हस्तक्षेप की मांग की तो पहले तो उन्होंने सहयोग का भरोसा दिलाया और बाद में बेशर्मी से पीछे हट गये। यह बात साबित करती है कि इस हम्माम में सब नंगे हैं। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो- ‘‘हाय हाय मैंने उन्हें देख लिया नंगा, अब इसकी मुझे और सजा मिलेगी !"
सार्वजनिक पैसों का इतना निर्लज्ज दुरुपयोग और संस्थाबद्ध भ्रष्टाचार एवं शोषण का ऐसा वीभत्स प्रदर्शन विरले ही देखने को मिलता है। समाज के संवेदनशील , जनपक्षधर और प्रगतिशील लोगों की ऐसी घटनाओं के प्रति मुर्दा खामोशी सचमुच एक अज्ञात रहस्य की तरह है। क्या हम सब हत्यारों के साझीदार हो गये हैं ? क्या साम्राज्यवाद हर विरोध को सहमति में बदलने में कामयाब हो गया है ? अगर नही तो इस नपुंसक चुप्पी की और क्या वजह हो सकती है ? फैज अहमद फैज की ये पंक्तियाँ दुहराने का माकूल वक्त है यह शायद-
‘‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे बोल जबाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में तुन्द हैं शोले सुर्ख है आहन
खुलने लगे कुफलों के दहाने फैला हर इक जंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक्त बहुत है जिस्म-ओ-जबाँ की मौत से पहले
बोल कि सच जिन्दा है अब तक बोल जो कुछ कहने हैं कह ले।"

हर खासो-आम की अदालत में और जिन्दा लोगों के सामने इस पूरे मामले को रखते हुए मुझे पूरी उम्मीद है कि लोग इस गहन अंधकार के खिलाफ एकजुट होकर बदलावकारी हस्तक्षेप करेंगे।
उषा ,
संगीत अध्यापिका,बटरफ्लाइज ।

No comments:

बच्‍चे उन्‍हें बसंत बुनने में मदद देते हैं !