Wednesday, March 19, 2008

कैलाश सत्‍यार्थी जी यह पब्लिक है सब जानती है

आशीष (बोल हल्ला ब्लॉग स्पॉट पर)

Thursday, 24 January, 2008

(इस रिपोर्ट को पढ़कर मुझे और मेरे जैसे कई लोगों को थोड़ा दुख हो सकता है। समाज सेवा और इससे जुड़े लोगों की मैं बहुत इज्‍जत करता हूं लेकिन आज जब जनपथ पर यह रिपोर्ट पढ़ा तो कैलाश सत्‍यार्थी से पहली मुलाकात याद आ गई । उनसे पहली बार मैं जयपुर में एक कार्यक्रम में मिला था। दी संडे इंडियन के एक पत्रकार ने एक स्‍टोरी की है जो मशहूर बचपन बचाओ आंदोलन के बारे में है...पता चला है कि इस स्‍टोरी पर संस्‍था के प्रमुख कैलाश सत्‍यार्थी द्वारा उन्‍हें जान से लेकर नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दी जा रही हैं। अब इस रिपोर्ट को पढकर आपकी अपनी राय जरुर देंताकि कैलाश सत्‍यार्थी और इन जैसे समाज सेवा के ठेकेदारों को पता चले कि जनता आपके बारें क्‍या सोचती है। यदि आपको और कुछ जानकारी मिलती है तो इसे बोलहल्‍ला के साथ बांटिएगा जरुर।)

हरेक महान शुरुआत आखिरकार लड़खड़ाने को अभिशप्त होती है। प्रत्येक महान यात्रा कहीं-न-कहीं तो समाप्त होती ही है। - संत औगस्तीन।

भारत के संदर्भ में भी यह बात नई नहीं है, बात आप चाहे जिस भी क्षेत्र की कर लें। यही बात समाज की सेवा के महान उद्देश्य और परोपकार के महान धर्म को ध्यान में रखकर शुरु हुई गैर-सरकारी, सामाजिक या फिर स्वयंसेवी संगठनों के साथ भी लागू होती है। जो विचारक या निर्देशक इनकी शुरुआत करता है। ताजा मामले की बात हम बचपन बचाओ आंदोलन, ग्लोबल मार्च या असोशिएशन फॉर वोलंटरी एक्शन(आवा) से कर सकते हैं. ये तीन नाम इस वजह से क्योंकि इन संस्थाओं का ढांचा ही ऐसा है. सारे एक-दूजे से जुड़े और अलग भी. ऊपर से इस मामले के पेंचोखम इतने कि आम आदमी तो उनको समझने में ही तमाम हो जाए या उसे यह शेर याद आ जाए- जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं. बहरहाल, मामला अभी टटका और ताजा है. इस पूरे मसले में तमाम नामचीन शख्सियतें उलझीं हैं और साथ ही मीडिया भी अपना अमला पसारे है. पूरे फसाद की जड़ में है दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित इब्राहिमपुर में मौजूद बालिका मुक्ति आश्रम. कभी हमसफर रहे दो लोग ही अब एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं. तलवारें तन चुकी हैं, बखिया उधेड़ी जा रही है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और दोनों ही खेमे एक-दूजे के चरित्र हनन पर आमादा हैं.

बहरहाल, मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इस पूरे घटनाक्रम का इतिहास जानना होगा। बालश्रम को खत्म करने और बंधुआ मजदूरों को बचाने के पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर दो महानुभाव इकट्ठा हुए. ये दोनों ही आज काफी नामचीन हैं-स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी. 80 के दशक में शुरु हुआ यह सफर काफी मशहूर हुआ और सफल भी. इसका नाम फिलहाल बचपन बचाओ आंदोलन है, पर इसकी शुरुआत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने की थी और उस वक्त संस्था के तौर पर साउथ एशियन कोलिशन अगेंस्ट चाइल्ड सर्विटयूड (साक्स) का निर्माण किया गया. इसमें पेंच केवल एक आया, जब 93-94 में स्वामी अग्निवेश इस आंदोलन से अलग हो गए. बहरहाल स्वामी अग्निवेश से इस मसले पर जब पड़ताल की गई, तो उन्होंने कुछ ऐसा बयान दिया, ''देखिए, असल में बंधुआ मुक्ति मोर्चा(बीएमएम) ने ही इस पूरे आंदोलन की शुरुआत की थी. आप जो आश्रम देखकर आ रहे हैं, वह भी असल में बीएमएम का ही बनाया हुआ था. बाद में मुझे महसूस हुआ कि कैलाश जी उसका और भी कोई इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. उसी समय हम दोनों में कुछ बातचीत हुई और मैंने अलग होने का फैसला कर लिया. ''खैर, अब आते हैं तात्कालिक मसले पर. फिलहाल विवाद की जड़ में है बालिका मुक्ति आश्रम और कभी कैलाश सत्यार्थी की करीबी सहयोगी और इसकी संचालिका रहीं सुमन ही खम ठोंककर मैदान में आ खड़ी हुई हैं. लाखों रुपए मूल्य की यह संपत्ति किसी व्यक्ति ने संस्था को दी थी और शायद यही वजह है-तलवारें खिंचने की. मामला तब सुर्खियों में आया, जब पिछले महीने मीडिया में यहां की कुछ लड़कियों के यौन-शोषण की खबरें आईं. वे लड़कियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लाई गईं थीं और आश्रम में रह रही थीं. बच्चियों ने मसाज करवाने की बात भी स्वीकारी. साथ ही सुमन और संगीता मिंज(फिलहाल आश्रम की केयरटेकर) पर तो दलाली के भी आरोप लगे. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सेंगर इसे कुछ ऐसे बयान करते हैं, ''देखिए, हम व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन आप रांची जाकर पता करें तो इनके खिलाफ कई मामले दर्ज पाएंगे. उन पर तो एफसीआरए के तहत भी आंतरिक कार्रवाई चल रही है. उन्होंने 2004 में अपनी एक अलग संस्था द चाइल्ड ट्रस्ट बनाई और संस्था की संपत्ति को निजी तौर पर इस्तेमाल किया. अपने लिए गाड़ी खरीदी और कई सारी वित्तीय अनियमितताएं की. हमारे पास सारे जरूरी कागजात हैं और आप उनको देक सकते हैं. ''हालांकि सुमन का इस मसले पर कुछ और ही कहना है. वह कहती हैं, ''ये सारे आरोप निराधार और बेबुनियाद हैं. मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. दरअसल यह सारा कुछ आश्रम पर कब्जा करने को लेकर है. उन्होंने तो मेरे कमरे को भी हथिया लिया और मेरे सामान को उठा लिया. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि आश्रम में सुरक्षा के लिए हमें पुलिस से गुहार करनी पड़ी है. कैलाश जी ने संस्था में अपनी बीवी और बेटे को स्थापित कर यह सारा झमेला खड़ा किया है. अगर मैं इतनी ही बुरी थी तो 22 सालों तक ये चुप क्यों रहे और मुझे बर्दाश्त क्यों करते रहे?''खैर, अब जरा पीछे की ओर लौट कर इस पूरे विवाद की जड़ देखें. साक्स से बीबीए की यात्रा में कई पड़ाव आए. संस्था जैसे-जैसे बढ़ती गई, विवाद भी गहराते गए. आखिरकार 2004 में यह तय किया गया कि आवा एक मातृसंस्था रह जाएगी और इसके बैनर तले सेव द चाइल्डहुड फाउंडेशन, बाल आश्रम ट्रस्ट, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर और द चाइल्ड ट्रस्ट बनाए जाएंगे. यही से पूरा बवाल शुरु हुआ. सुमन का कहना है, ''आप खुद देख सकते हैं कि कैलाश जी ने किस तरह अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया. अपनी पत्नी को तो उन्होंने सेव द चाइल्डहुड...का अध्यक्ष बना दिया, तो बेटे को बाल आश्रम...का. ग्लोबल मार्च...के तो वह खुद ही मुख्तार हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी के ट्रस्ट में ही उन्होंने सारे संसाधनों का रुख कर दिया. यही सब विवाद की जड़ में है. ''हालांकि इस संवाददाता ने जब बीबीए के वर्तमान अध्यक्ष रमेश गुप्ता से बात की, तो उनका कुछ और ही कहना था. वह बताते हैं, ''हमने तो सुमन को हमेशा ही सम्मान दिया है. लेकिन जब उसकी हरकतें नाकाबिले-बर्दाश्त हो गई तो हमें मामले को उजागर करना ही पड़ा. हमने तो उसे एक खुला पत्र भी लिखा है, उससे आप सारी बातें जान सकते हैं. उसने एक भी निर्णय का सम्मान नहीं किया. कभी भी वित्तीय पारदर्शिता नहीं दिखाई और आवा के संसाधनों का दुरुपयोग कर अपनी खुद की संस्था को पालती-पोसती रही. खुद को तो उसने जैहादी के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया, लेकिन बाकी साथियों का नाम भी नहीं लिया. यह सचमुच अफसोसनाक है. ''राकेश सेंगर तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि जबरिया निकालने वगैरह की बात बिल्कुल बेबुनियाद है. बाल आश्रम की लीज तो वैसे भी 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी. फिर इस्तीफा भी उनसे जबरन नहीं लिया गया. जब उन्होंने संस्था छोड़ दी तो फिर वैसे ही आश्रम में उनके बने रहने की कोई तुक नहीं थी. जहां तक उनके कमरे से कुछ लेने की बात है, तो यह तो बिल्कुल अनर्गल प्रलाप है. आप खुद ही बताएं किसी स्वयंसेवी संस्था में काम करनेवाली महिला के पास 2 किलो सोना कहां से आ गया? हालांकि, कैलाश सत्यार्थी इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लेते हैं. वह कहते हैं, ''भई, मेरा तो न बाल आश्रम और न ही बालिका आश्रम से कोई लेना-देना है. वहां से तो मैं डेढ़ साल पहले ही अलग हो गया था. आप मुझसे ग्लोबल मार्च के बारे में पूछें तो कुछ बता सकता हूं.''हालांकि अपने परिवार के बारे में पूछने पर वह बिफर पड़े. इस संवाददाता को धमकी भरे लहजे में कैलाश जी ने कहा, ''अगर मेरा बेटा या पत्नी किसी संस्था का नेतृत्व करने लायक हैं तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी वे दूसरे संस्थानों से जुड़े हैं. आप बेबुनियाद बातें न करें, वरना आपका करियर भी खतरे में पड़ सकता है. '' हालांकि इसके ठीक उलट राकेश सेंगर का कहना है कि अगर कैलाश जी के बेटे की बात साबित हो जाए तो वह सामाजिक जीवन ही छोड़ देंगे. बहरहाल, आरोपों की इस झड़ी में नुकसान सबसे ज्यादा तो उन बच्चों का हो रहा है, जिनका जीवन सुधारने के मकसद से इस आंदोलन की शुरुआत हुई है. साथ ही कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब खोजने होंगे. मसलन, वे लड़कियां अब कहां हैं, जिन्होंने मीडिया के सामने आकर मसाज की बात कबूल की थी? फिर मीडिया पर भी कुछ उंगलियां उठेंगी. जैसे, क्या हरेक रिपोर्टर ने इब्राहिमपुर जाकर पड़ताल की थी?जब यह संवाददाता बालिका आश्रम में पहुंचा, तो नजारा कुछ और ही था. वहां बाकायदा सारे काम सामान्य तौर पर ही हो रहे थे. फिलहाल वहां 25 बच्चियां हैं. जिसमें से चार वयस्क हैं. वहां सात-आठ बच्चियों के अभिभावक भी थे. जब हमने बच्चियों से बात की तो उन्होंने सारी बातों से इंकार किया. उनके अभिभावकों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए आश्रम के काम की तारीफ ही की. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन पर किसी तरह का दबाव है, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया. वहां की एक कर्मचारी बबली ने बताया, ''मीडिया ने एकतरफा रपटें छापी और दिखाई है. हमारा पक्ष किसी ने जानने की भी कोशिश नहीं की. आप खुद बताएं अगर यहां मसाज जैसे काम होते रहे हैं, तो क्या दूसरे लोग भी अपराधी नहीं सिध्द होते? फिर महिला आयोग ने जिन बच्चियों को निर्मल छाया भेजा, आप खुद उनके कागजात देख सकते हैं. उनके साथ उनके अभिभावकों ने भी अपनी सहमति से जाने की बात लिख कर दी है. यहां आप खुद आए, तो हालात आपके सामने हैं.''बहरहाल, जब इस संवाददाता ने बाल आश्रम जाकर चीजें देखने का फैसला किया, तो उसे अंदर घुसने की अनुमति नहीं दी गई. सवाल कई हैं, जवाब अधूरे या मुकम्मल नहीं हैं. वैसे, यह कहानी किसी एक गैर-सरकारी संगठन की नहीं है. बटरफ्लाई नाम की एक संस्था में भी एक कर्मचारी के लैंगिक -शोषण और दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है. साथ ही वहां अचानक कई कर्मचारियों की बर्खास्तगी भी विवाद का विषय है.इसी तरह ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नाम की संस्था में एक महिला कर्मी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. इसी तरह जंगपुरा में (जो दिल्ली की महंगी जगहों में से एक है) भी करोड़ों रुपए की संपत्ति को लेकर एक संस्था में खींचतान जारी है. यहां विलियम केरी स्टडी एंड रिसर्च सेंटर और क्रिश्चियन इंस्टीटयूट फॉर स्टडी एंड रिलीजन के बीच तलवारें खिंची हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं मूल रूप से एक ही हैं और एक ही व्यक्ति इनका जनक भी था. मामला यहां भी संपत्ति का ही है.बहरहाल, तालाब की सारी मछलियां गंदी ही नहीं, पर ऐसे उदाहरण इस क्षेत्र के महान उद्देश्य पर सवालिया निशान तो खड़ा कर ही देते हैं. यक्ष प्रश्न तो बचा ही रहता है, क्या ये स्वयंसेवी संगठन अपने मूल की ओर वापस लौटेंगे? क्या लोगों के कल्याण हेतु बनी संस्थाएं उसी काम में लगेंगी? या फिर, यह सिरफुटव्वल जारी रहेगी?(साभार - दी संडे इंडियन)

at 4:10 PM

5 आपकी राय:
अनिल पाण्डेय said...
jankari kabile gaur hai.
24 January, 2008 4:22 PM
कमल शर्मा said...
बेहतर रिपोर्ट। पहले मीडिया पर...मेरे ख्‍याल से सारे मीडिया वाले आश्रम नहीं गए होंगे और दिल्‍ली में ही दूसरी जगह पर बैठकर या फोन पर बात कर रिपोर्ट बनाई होगी क्‍योंकि आजकल टीवी में तो हर रिपोर्टर घोड़े पर सवार है सो उसके पास कहीं जाने का वक्‍त ही नहीं है।अब आश्रम पर। ज्‍यादातर समाजसेवक और समाज नेता आर्थिक भ्रष्‍टाचार और सेक्‍स में डूबे हुए हैं। समाजसेवा के नाम पर हर तरह से हाथ फेरने में ये लोग माहिर हो चुके हैं। सरकार को चाहिए कि जरुरतमंद लोगों का ध्‍यान रखने के लिए वह खुद संस्‍थाएं बनाएं और उनके मानक तय करें। निजी संस्‍थाओं के कर्ताधर्ता इसी तरह लड़ते हैं, पैसे खाते हैं और यौन कार्य में लिप्‍त रहते हैं। इन लोगों के बारे में यह पता लगाना चाहिए कि इनका घर कैसे चलता है जब ये कहीं नौकरी नहीं करते। केवल संस्‍थाएं चलाते हैं। हमें तो लगता है कि एक महीना नौकरी न करे तो अगले महीने घर नहीं चला पाएंगे लेकिन ये निखट्टू तो जिंदगी भर नौकरी या कारोबार नहीं करते और ऐशों आराम की जिंदगी जीते हैं। इन मक्‍कारों की आय और आयकर के बारे में जांच होनी चाहिए।
24 January, 2008 4:39 PM
उमाशंकर मिश्र said...
ashish ji , yeh ek mahtavpurn shoochna di hai aapne.... iski aur bhi padtal ki jayegi.... desh bahr me jis tarah se ngo's ki fauj khadi ho rahi hai achhi baat kahi ja sakti hai, lekin vidambana hai ki kabhi swaal nahi pooche jaate ki kya ye sansthayen apna kaam bakhoobhi nibhati hai. bundelkhand me bhi log marne lage hain.....kanha thi ye samajsevi sansthayen....iss tarah ke swaalon se ye samjsewi tilmila jate hain.... ho sakta hai... ab bundelkhand me marte huye logo ko jilane ke naam par kuchh aur ngo's ban jayen... sarkari rahnaumaon ne bhi iss field ko durgandh se bhar diya hai aur smaaj sewa ka jajba upekshit hua hai.....sharm sharm sharm
24 January, 2008 4:43 PM
राजीव जैन Rajeev Jain said...
निश्चित रूप से कुछ न कुछ घालमेल है वहां पर। अब यह छिपा हुआ नहीं है कि समाजसेवा की आड में क्‍या क्‍या होता है। कल ही हिंदुस्‍तान ने अपने ही मित्र अजीत सिंह की एक खबर प्रकाशित की है किफर्जी समाज सेवा में यूपी नंबर वन मेरठ। सत्ता प्रतिष्ठान को समाजसेवा की घुट्टी पिलाने वाली गैर सरकारी संस्थाओं का एक चेहरा यह भी है और यह है प्रोजेक्ट में अनियमितता और सरकारी धन का दुरुपयोग। इसमें उत्तर प्रदेश की संस्थाएं सबसे आगे हैं । महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने देश की दो हजार से ज्यादा एनजीओ को ब्लैक लिस्टेड किया है । इनमें सबसे ज्यादा 332 संस्थाएं उप्र की हैं । इन संस्थाओं पर सरकारी फंड के दुरुपयोग और दिए गए प्रोजेक्ट में अनियमितताएं बरतने का आरोप है । बार-बार चेतावनी देने के बाद भी इन अनियमितताओं पर लगाम लगती न देख महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इन्हें ब्लैक लिस्टेड किया है । इन संस्थाओं के नाम मंत्रालय की वेबसाइट में डाले गए हैं । मिली जानकारी के मुताबिक सेंट्रल सोशल वेलफेयर बोर्ड इन ब्लैक लिस्टेड एनजीओ के मामलों की सुनवाई क रे गा। सुनवाई में अगर संस्थाएं खुद को सही साबित करती हैं तो उसका नाम काली सूची से बाहर निकाला जा सक ता है । ब्लक लिस्टेड एनजीओ के मामलों में राजस्थान और हिप्र की स्थिति बेह तर है । राजस्थान से 89 और हिमाचल प्रदेश से 53 एनजीओ काली सूची में हैं। मेरठ और अलीगढ¸ की 13 एनजीओज् महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी सूची के मुताबिक मेरठ की छह और अलीगढ¸ की सात एनजीओ को काली सूची में डाला गया है । इन संस्थाओं में मेरठ की सर्व इंडिया, ग्रामीण विकास मंडल, गामोद्योग विकास मंडल, ग्रामीण उत्थान संस्थान, नवीन जनकल्याण संस्थान, शीतल कौर नारी उत्थान संस्थान शामिल हैं। गौरतलब है कि हाल ही में ग्रामीण विकास पर अनुदान देने वाले संगठन के पार्टनर मेरठ की संकल्प और भोर संस्था के खिलाफ कार्रवाई क रने के निर्देश दिए थे। पिछले महीने मेरठ में ही जिला पंचायत के निर्माण कायर्ों में कोताही बरतने वाली एक संस्था के खिलाफ सिविल लाइन थाने में एफ आईआर दर्ज की गई थी। भ्रष्ट एनजीओ के टॉप फाइव गढ¸ उत्तर प्रदेश 332 मेघालय 323 तमिलनाड 304 आन्ध्र प्रदेश 287 पंजाब 223* स्‍त्रोत-महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
24 January, 2008 5:09 PM
आशेन्द्र सिंह said...
समाज सेवा के नाम पर मसीहा बनने और राजनीति में प्रवेश करने का औजार हमारे देश में कई लोगों ने अपनाया है . कैलाश जी भी उन्ही में से एक हैं. मैंने भी उनके और उनकी श्रीमती जी के उपदेशात्मक इंटरव्यू लिये और छापे हैं ,लेकिन जब हकीकत से वाकिफ हुआ तो तथ्यगत जानकारी को आधार बना कर पानी उतरने में भी कसर नहीं छोड़ी. आप देशबंधु भोपाल (19 अप्रेल 2004 ) के सरोकार पेज पर ' ग्लोबल एक्शन वीक : बच्चों के नाम पर एक और जलसा ' पढ़ सकते हैं .

Friday, March 14, 2008

एड्स नियंत्रण का अनकहा सच

(एड्स नियंत्रण के नाम पर इस देश में जितने बड़े पैमाने पर गोरखधंधा चल और फल-फूल रहा है इसकी दूसरी कोई मिसाल शायद ही ढूँढने पर मिले। यह किस्सा इस वक़्त के बहुचर्चित ब्लॉग मोहल्ला पर तीन किस्तों में आया था। दिलीप मंडल के इस रहस्योद्घाटन को हम यहाँ आभार सहित रख रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लोग साम्राज्यवाद प्रायोजित प्रचार के घटाटोप में सच देख नहीं पा रहे।)

गन्दा है पर धंधा है ये
दिलीप मंडल
( एड्स खतरनाक बीमारी है। इस बात को आप अपने निजी अनुभव, आस-पास रिश्तेदारी, दोस्तों, मोहल्ले, कस्बे, अपार्टमेंट में होने वाली मौतों से बेशक महसूस न कर पाएं, लेकिन सरकार से लेकर तमाम एनजीओ और विश्वभर की संस्थाएं आपको यही समझाने की कोशिश कर रही हैं। आइए जानते हैं कुछ तथ्यों के बारे में। ये सारे तथ्य भारत सरकार ने संसद में लिखित रूप में रखे हैं। ये सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े है। इन सबके लिंक दे रहा हूं, ताकि निष्कर्ष पर विवाद हो तो भी स्रोत सामग्री की विश्वसनीयता बनी रहे। - दिलीप मंडल)

एड्स से भारत में हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार कहती है कि 2004-5 में 1678, 2005-2006 में 1624 और 2006-2007 में 1786 लोग एड्स की वजह से मौत के शिकार हुए। स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये आंकड़ा 7 सितंबर 2006 को संसद में पेश किया। ये उस सरकार के नतीजे हैं जो एड्स को देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या मानती है और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में जिस एक बीमारी का जिक्र है वो एड्स ही है।टीबी और कैंसर से हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार ने संसद को बताया है कि कि हर साल 18 लाख से ज्यादा लोगों को टीबी होता है और साल में 3 लाख 70 हजार से ज्यादा लोग टीबी से मरते हैँ। दुनिया में टीबी के कुल केस का 20 परसेंट सिर्फ भारत में दर्ज होता है। यानी दुनिया में टीबी का हर पांचवां मरीज भारतीय है।कैंसर की बात करें तो आईसीएमआर के जरिए राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री में हर साल 7 से 9 लाख नए कैंसर मरीजों के मामले हर साल दर्ज होते हैं और हर साल 4.4 लाख लोग कैंसर से मरते हैं। कैंसर भारत में मौत की चौथी सबसे बड़ी वजह है। ये आंकड़े आप संसद की साइट पर देख सकते हैं।

एक मौत 1.29 करोड़ रुपए की और दूसरी मौत 3,181 रुपए की
(मौत को रुपए में आंकने से बुरी बात क्या हो सकती है। लेकिन बात इतनी कड़वी है कि इसे मीठे अंदाज में पेश करना मुश्किल है। बात एड्स के अर्थशास्त्र और राजनीति की हो रही है। एड्स सचमुच एक अद्भुत बीमारी है। इसे लेकर पढ़ने बैठा तो जानकारियों को पिटारा खुलता चला गया। आप भी इस चर्चा में हिस्सेदार बनें। आखिर ये आपकी सेहत का मामला है - दिलीप मंडल)


पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए। आपको एड्स न हो जाए, इसके लिए ये रकम पांच साल में खर्च की जाएगी। पैसा सरकार भी खर्च कर रही है और दुनिया भर से बरस भी रहा है। और देश में मची है इस पैसे की लूट। इस लूट में कई हिस्सेदार हैं। लूट तो देश-दुनिया में और भी कई किस्म की हो रही है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश में जहां 30-40 रुपए के आयरन टैबलेट न मिलने के कारण न जाने कितनी गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे दम तोड़ देते हैं, वहां ये लूट मानवता के खिलाफ अपराध है। देखिए एड्स के लिए आ रहे पैसे का ऑफिशियल लेखाजोखा :बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन से आएंगे 1425 करोड़ रुपए।ग्लोबल फंड टू फाइड एड्स, ट्यूबरकलोसिस एंड मलेरिया से मिलेंगे 1787 करोड़ रुपए।वर्ल्ड बैंक देगा 1125 करोड़ रुपए।डीएफआईडी से आएंगे 862 करोड़ रुपए।क्लिंटन फाउंडेशन ज्यादा पैसे नहीं दे रहा है, वहां से आएंगे 113 करोड़ रुपए।यूएसएड से 675 करोड़ रुपए आ रहे हैं।यूरोपियन यूनियन को भी भारत के एड्स पीड़तों से हमदर्दी है और वो 77 करोड़ रुपए दे रहा है।संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग एजेंसियों 323 करोड़ रुपए दे रही हैं।दूसरे विदेशी स्रोतों से 741 करोड़ रुपए आ रहे हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार से मिलने वाले 450 करोड़ रुपए शामिल हैं।भारत सरकार के बजटीय आवंटन को जोड़ दें तो ये रकम हो जाती है 11,585 करोड़ रुपए।ये वो रकम है जो पांच साल के राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम फेज-3 पर खर्च होनी है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के एक प्रेजेंटेशन के पेज 44-45 पर आप पूरा हिसाब देख सकते हैं। संसद की साइट पर भी विदेश से आने वाले पैसे का हिसाब किताब आपको इस लिंक पर दिखेगा। वैसे ये तो सीधा साधा हिसाब हैं वरना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी फोकस एड्स पर ही कर दिया गया है।

कंडोम बांटते एनजीओ और एड्स का कारोबार
(पिछली दो पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह एड्स से साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है, लेकिन एड्स से लड़ने के नाम पर आने वाला पैसा लगातार बढ़ता जा रहा है। आपने ये भी पढ़ा कि एड्स की एक मौत को टालने पर सवा करोड़ रुपए खर्च होते हैं जबकि कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली मौत से निबटने के लिए औसत खर्च 3181 रुपए है। पैसा किन स्रोत से आ रहा है इसकी भी बात हो चुकी है। अब जानते हैं ये पैसा जा कहां रहा है। - दिलीप मंडल)एड्स के नाम पर आ रहे अंधाधुंध पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा (73%) खर्च किया जा रहा है लोगों को अवेयर बनाने के लिए। यानी पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़ नाटक, बुकलेट, विज्ञापन आदि पर। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को दिए प्रेजेंटेशन में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नैको ने बताया है कि एड्स जागरूकता के विज्ञापन 2006 में 19,250 बार टेलीविजन चैनलों पर दिखाए गए।इसी प्रेजेंटेशन में बताया गया है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत 2007 से 2012 के बीच सरकार देश में 2031 करोड़ रुपए के कंडोम बांटेगी। ये रकम तो सिर्फ एनएचआरएम के तहत कंडोम खरीदने पर खर्च होनी है। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) का खर्च इससे अलग है। एनएसीपी के तहत देश में कंडोम की कुल खपत 3।5 अरब सालाना पर ले जाने का इरादा है। देश की कुल जनसंख्या में आधी आबादी और बच्चों और बूढ़ों के साथ उन लोगों की संख्या घटा दें जो अपना कंडोम खुद खरीदतें हैं, तो प्रति व्यक्ति कंडोम की खपत का रोचक आंकड़ा निकलेगा। एड्स के नाम पर हो रहे खर्च में चूंकि अस्पतालों की खास भूमिका नहीं है (क्योंकि मरीज कहां से आएंगे)। ये खर्च हो रहा है एनजीओ के माध्यम से। एड्स की जागृति फैलाने में एक लाख बीस हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप को ट्रेनिंग दी जा रही है। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एड्स के लिए पैसा आता रहे और स्वास्थ्य पर खर्च की प्राथमिकताएं न बदलें इसमें कितने लोगों का स्वार्थ जोड़ दिया गया है।संख्या का हिसाब देखें तो अभी पौने तीन लाख लोग फील्ड वर्कर के तौर पर एड्स की जागरूकता फैला रहे हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 2012 तक इनकी संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन लाख करने का इरादा है। एडस कंट्रोल कार्यक्रम से एक लाख तेरह हजार डॉक्टरों और लगभग एक लाख नर्सों को भी जोड़ा जा हा है। यानी हमारे देश में एड्स बेशक बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन ये बहुत बड़ा रोजगार जरूर है। ये सरकारी आंकड़े तो बता रहे हैं कि एड्स से मिलने वाला रोजगार बीपीओ सेक्टर के रोजगार से भी ज्यादा है।

Thursday, March 13, 2008

नींद में सपना, सपने में घर

(सतीश जायसवाल की यह कहानी सितम्बर में बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम की कहानी पत्रिका में छपी थी। यहाँ हम लेखक तथा बीबीसी हिन्दी के प्रति आभार प्रकट करते हुए इसे इस ब्लॉग के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।)


अदालत के फैसले ने हाजी होटल के मालिक के होश उड़ा दिए. सुबह से भरा बैठा था और उसका सारा गुस्सा अख़बार पर था, जिसमें अदालत का फैसला छपा था. छपा था कि जिस होटल में बाल श्रमिक काम पर मिलेंगे उनको प्रत्येक बाल श्रमिक के पीछे 20 हज़ार रुपए जमा करने पड़ेंगे. कहां से आएंगे इतने रुपए? इतने में तो पूरा होटल बिक जाएगा. हाजी होटल के मालिक की सांस ऊपर-नीचे होने लगी. तभी छछूंदर उसके सामने पड़ गया.
हाजी होटल के मालिक ने ही आदम की इस औलाद का नाम छछूंदर रखा था. वह अपने घर से भागा हुआ था. इस नाम की आड़ में उसे छिपने की जगह मिल गई और पेट भरने के लिए हाजी होटल में काम मिल गया. रिश्तेदारों के साथ मिलकर उसे खोजने और घर वापस ले जाने के लिए उसके घर वाले आए थे. लेकिन उसकी तकदीर में तो बाल श्रमिक होना लिखा था.
छछूंदर के सामने न अदालत का फैसला था न फैसले को छापने वाला अख़बार था. होता भी तो क्या होता? न उसे पढ़ना आता, न लिखना. उसके सामने तो आधी रात होती है और पूरा दिन होता है. दिन भर जूठे बर्तन रात को ही मांज-धो कर रखने पड़ते हैं. इसके बिना सोने को नहीं मिलता. सुबह भी जब रात बकाया रहती है तभी उसे उठा दिया जाता है. शुरू के दिनों में तो इस तरह आधी अधूरी नींद से उठा दिए जाने पर वह रोने लगता था. बाद में धीरे-धीरे आदत पड़ गई.
छछूंदर के सामने पड़ते ही हाजी होटल का मालिक उस पर फट पड़ा. उसने हाथ में रखे अख़बार को हवा में लहराया और दहाड़ा, 'इधर आ, शैतान की औलाद'.
छछूंदर का कहीं, कोई कसूर नहीं था. फिर भी उसकी शामत आती दिखी. लेकिन इससे पहले ही वह भाग निकला.
इस बार वह दूसरी बार भाग रहा था. पहली बार वह घर से भाग था और इस बार वह हाजी की होटल से भाग रहा था. रात ठंडी थी और ओस बर्फ की तरह पड़ रही थी. वह अपने को ठंड से बचा रहा था और नींद उस पर हावी हो रही थी.
नींद में सपना था. सपने में घर था. घर, पता नहीं किसका था? फिर भी घर था. वहां मजबूत कद-काठी का एक वृद्ध था. वह पिता की तरह दिख रहा था. किसका पिता? क्या पता. बच्चे भी थे. बच्चे उसे अपने भाई-बहनों की तरह लगे. एक मां भी थी. मालूम नहीं, सगी या सौतेली. फिर भी माँ थी.
घर की फर्श गोबर से लिपी हुई थी. वहां पुआल का गरम बिछौना था और दुबक कर सो जाने के लिए रजाई भी. सपने में वह सब कुछ था, जो उसकी स्मृतियों में रहा होगा.
सपना टूटा तो वह सड़क पर था. वह किसी पराए शहर में था और उस पर धूप पड़ रही थी. वह किसी और की जगह थी जहां वह सो गया था इसलिए वे सबके सब उस पर नाराज थे. वे सबके सब गिरोहबंद थे और छछूंदर एक अकेला था. उसके बीच वह बाहर का था. तभी बाल वेश्या वहां आई और फुटपाथ पर रहने वाले उन गिरोहबंद बच्चों के साथ उसने छछूंदर की दोस्ती करा दी. फिर उसने छछूंदर से पूछा-भूख लगी है कुछ खाएगा?
उसे भूख लग रही थी. लेकिन वह स्नेह में भटक गया. बाल वेश्या किसी माँ की तरह उसका ख्याल रख रही थी. छछूंदर उससे पूछा क्या तू माँ है?
बाल वेश्या ने जवाब दिया - नहीं. अभी मैं छोटी हूं. थोड़े दिन में बन जाऊंगी.
उसने छछूंदर को एक रहस्य की बात बताई- मैं जानती हूं कि माँ कैसे बनती है.
छछूंदर का मन भी उस रहस्य को जानने के लिए हुआ. लेकिन बाल वेश्या ने उसे बताया वहां मेरी फ़िल्म चल रही है.
वहां प्रशासनिक भवन था और उसके सेमिनार हाल में बाल वेश्या की फ़िल्म चल रही थी. फ़िल्म को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए थे. लेकिन छछूंदर को विश्वास नहीं हो रहा था. बाल बेश्या ने जोर देकर कहा-‘भरोसा नहीं हो रहा है ना? तो भीतर जाकर खुद देख ले.’
दोनों को मालूम था कि भीतर नहीं जा सकते. भीतर बड़े लोग थे और बड़ी बातें हो रही थीं. बाल वेश्या बाहर थी और भीतर उसकी फ़िल्म दिखाई जा रही थी. बाल बेश्या अपनी कहानी बता रही थी. फ़िल्म में जो दिखाया जा रहा था वह उसके साथ सचमुच में हुआ था.
प्रशासनिक भवन के भीतर चल रहे सेमिनार में बाल अधिकारों पर चर्चा हो रही थी. इसलिए वहाँ दिखाई जा रही फ़िल्म में भी बाल वेश्या थी. वे सबके सब बाल वेश्या के लिए चिंताएं कर रहे थे. लेकिन बाल वेश्या सबकी चिंता कर रही थी. फुटपाथ पर वाले उन सबके साथ छछूंदर की भी चिंता कर रही थी. छछूंदर उनके बीच नया था और भूखा था. बाल वेश्या ने उसे धीरज बंधाया-थोड़ा रूक. जब ये लोग खाकर चले जाएंगे तो हमको खाना मिलेगा.’
वहां भोजन था और बाल वेश्या को पता था कि भीतर, उसकी फ़िल्म देख रहे और उस पर चिंता कर रहे लोग खाते कम हैं और छोड़ते अधिक हैं.
पता नहीं वे लोग खाने के लिए कब आएंगे?
फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को भूख लग रही थी. अपनी भूख को भुलाने के लिए उन सबने मिलकर एक खेल खोज लिया. वहां पोस्टरों की सजावट थी और पोस्टरों में दुनिया भर के बाल श्रमिकों के चित्र थे. फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों ने पहले तो इन चित्रों की खिल्ली उड़ाई. लेकिन जब उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो इधर से दोस्ती की पहल हुई. इस पर भी जब कोई बात नहीं बनी तो वे सब मिलकर गालियां बकने लगे.
छछूंदर को कुछ समझ में नहीं आया कि ऐसे में उसे क्या करना चाहिए. अब तक तो उसने गालियां सुनी भर थी. लेकिन अब वह गालियां बकने वालों की तरफ था. फिर भी वह अलग था. तभी एक अक्षर यात्री उधर से गुजरा. उसके कंधे पर अक्षर छाप झोला था और वह साक्षरता कार्यक्रम का एक स्वयंसेवक था.
सेवा के बदले में उसे एक अक्षर छाप झोला और अक्षर यात्री का नाम मिला था. वह एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता था और निरक्षरों को साक्षर बनाने का काम उसने धर्म-भाव से अपनाया था. उसने अक्षरों के साथ अनाचार होते देखा तो वहीं रुक गया. उसे लगा कि यहां उसकी ज़रूरत है. उसने नारा लगाया-‘जय अक्षर.’
थोड़ी देर पहले गालियां बक रहे, फुटपाथ के बच्चों ने उसके साथ मिलकर नारा लगाया- जय अक्षर...’
उनको कुतूहल हो रहा था कि अक्षर की भी जैकार की जा सकती है? उन्होंने मिलकर दोहराया जय अक्षर...’
अक्षर यात्री का काम हो रहा था. लेकिन भीतर विघ्न पड़ने लगा. भीतर से स्टेट प्रोग्राम डायरेक्टर निकलकर बाहर आए. उन्हें आशंका हुई कि कोई ऐसी बात तो नहीं, जिसे बाहर से भीतर नहीं जाना चाहिए? उनकी नजर अक्षर यात्री पर पड़ी और वे संतुष्ट हो गए कि चिंता की कोई बात नहीं. उन्होंने अक्षर यात्री से पूछा- स्ट्रीट एज्युकेटर हो?
अक्षर यात्री ने जवाब दिया - वह तो आप देख ही रहे हैं. आप यह भी देख रहे हैं कि मैं क्या काम कर सकता हूँ.’ अब उसने काम की बात की- मैं भी सेवा करना चाहता हूं. विश्व के बाल श्रमिकों के लिए कुछ करना चाहता हूँ.
स्टेट प्रोग्राम डायरेक्टर ने कहा – देखेंगे. फंड आने वाला है. तब तक इसे देखो और पढ़ो.’
उन्होंने बाल श्रमिकों की रिपोर्ट अक्षर यात्री के हाथ में रख दी और बताया-‘यह बच्चों के अधिकार का धर्म-ग्रंथ है. इसके अनुसार दुनिया के बाल श्रमिक सभी निरक्षर होते हैं.
अक्षर यात्री ने आंखें मूंदकर उस धर्म-ग्रंथ को माथे लगाया. फिर उसने आंखें खोलकर देखा. धर्म-ग्रंथ की जिल्द पर एक बाल श्रमिक का चित्र है. चित्र में ढेर सारी गेंदें हैं और उनके बीच एक बाल श्रमिक- आंखे मूंदे सो रहा है. ये गेंदे अक्षर यात्री को बारूद के ऐसे गोलों की तरह लगीं जिनमें अब बारूद नहीं है. तभी तो, इनके बीच एक बाल-श्रमिक इतना निशंक और सुरक्षित है.
छछूंदर को वह बाल-श्रमिक बिल्कुल अपनी तरह लगा. छछूंदर को लगा कि वह भी अपने घर से भागा हुआ होगा और भूखा होगा. हो सकता है कि वह भी कोई सपना देख रहा हो. सपने में घर हो, खाना हो और नींद हो...

Saturday, February 23, 2008






विगत २१ फरवरी को जंतर मंतर पर बेघर बच्चों ने प्रदर्शन किया। वे गैर सरकारी संगठनों द्वारा सड़क के बच्चों का अमानवीय और बर्बर शोषण किए जाने के खिलाफ पिछले एक महीने से आन्दोलन कर रहे हैं। कुछ झलकियाँ।

Friday, February 22, 2008

बेघर बच्चों ने एनजीओ के खिलाफ जंतर मंतर पर किया प्रदर्शन

(सड़क पर रहने वाले बेघर-बेसहारा और कामकाजी बच्चों के संगठन बाल मजदूर यूनियन के बैनर तले विगत २१ फरवरी को सैकड़ों बच्चों ने जंतर मंतर पर इकठ्ठा होकर अपनी मांगों के साथ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में बच्चों ने सरकार, समुदाय और विभिन्न गैर सरकारी संगठनों द्वारा अनवरत जारी शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ डटकर मोर्चेबंदी करने की कसम ली और तय किया कि वे अब और बच्चों का व्यवसाय नहीं होने देंगे और ऐसे सभी संगठनों के काले कारनामों को सामने लायेंगे जो बच्चों की दुर्दशा का बाजारीकरण करते हुए मुट्ठी-भर लोगों की तिजोरियों के लिए सम्पदा जुटाने में लगे हैं। इस अवसर पर बच्चों ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के निदेशक को एक ज्ञापन भी दिया। हम यह ज्ञापन व्यापक जनता के सामने रख रहे हैं।)

हम सड़क पर रहने वाले और कामकाजी बच्चे हैं। हमारी ज़िंदगी अनंत दुखों और शोषण की कभी न ख़त्म होने वाली दास्तान है। सड़क पर आसरा लेने तथा वहां काम करने वाले बच्चों को कबाड़ चुनते , होटल या चाय की दूकान पर काम करते , कारखाने में खतरनाक काम करते , ठेले में धक्का लगाते, बोझ उठाते, मन्दिर की लाइन में लगकर खाना खाते, सड़क पर घूमते या खेलते, हर जगह पुलिस , मालिक, दलाल, नशेड़ी यहाँ तक कि आम राहगीर से भी गाली, मार सहनी पड़ती है और यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है।

हमारे शोषण का स्तर इतना वीभत्स और व्यापक है जिसे शब्दों में बयान कर पाना सम्भव नहीं है, संभवतः इसे वातानुकूलित, सभी सुख सुविधाओं से सुसज्जित घरों में बैठकर तो बिल्कुल ही नहीं समझा जा सकता है।

हमे हर पल मार-पीट, गन्दी गालियों और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। यदि कड़ी मेहनत करके कुछ रुपये कमा भी लिए तो उसे छीनने के दावेदार बहुत हैं (पुलिस, बदमाश आदि) और रात को सोना तो हमारे लिए एक संघर्ष होता है। हमे न सिर्फ़ सर्दी, गर्मी व बारिश से बचना होता है बल्कि सड़क पर घूम रहे ऐसे लोगों से भी बचना होता है जो हमारे यौन शोषण की ताक में रहते हैं। इन शोषण कर्ताओं और नशेड़ियों की संगत हमें ऐसी बीमारियाँ दे जाती हैं जो मेडिकल साइंस के लिए भी दुर्जेय, वीभत्स और दुर्लभ बीमारियाँ होती हैं।

हम सड़क के बच्चों का भविष्य तो पूछिए ही मत। हमारी आंखों में साधारण बच्चों की तरह डॉक्टर, वकील, टीचर आदि बनने के सपने नहीं पलते बल्कि यह चिंता रहती है कि अगले वक्त का खाना मिलेगा या नहीं। अगर खाना मिल भी गया तो सोना कहाँ होगा। या कि हमें जो बीमारी है उसका इलाज कैसे होगा? असीम शोषण और असुरक्षा हमें अनचाहे अनजाने ही सही पर अक्सर अपराध और गैर कानूनी रास्तों पर धकेल देती है।

हमारी तकलीफों और शोषण को बढाने का काम गैर सरकारी संगठन NGO ( बटरफ्लाइज जैसे ) और करते हैं। कहने को तो यह हमारे कल्याण के लिए काम करते हैं लेकिन वास्तविकता में ये सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं की आलोचना कर उनकी नाकामी विदेशी फंडरों और डोनरों को दिखाकर अपने ऐशो-आराम के लिए अपनी थैली भरते हैं। बटरफ्लाइज जैसी NGO बच्चों को एक पोस्टर भर मानती है। जब पोस्टर पुराना हो जाता है तो उसे उतारकर फेंक दिया जाता है। संस्था बच्चों को संख्या तथा उत्पाद भर मानती है जो उनके लिए डाटा भरने, झूठे किंतु लुभावने रिपोर्ट बनाने, करुणा से भर देने वाले फोटो खिंचवाने की चीज़ भर हैं जिनका इस्तेमाल कर वापिस उन्हें कूड़ेदान या गटर में फेंक दिया जाना चाहिए क्योंकि इनके अनुसार हमारी नियति यही है। इनके काम और अनवरत लाभ के लिए हमारा वहीं बने रहना ज़रूरी है। बटर फ्लाइज का उदाहरण देकर इसे आसानी से समझाया जा सकता है। इस संस्था ने अपने बीस वर्षों के इतिहास में तथाकथित बाल हितैषी कार्यक्रमों के लिए लगभग 50 करोड़ रुपये जुटाए तथा खर्च किए होंगे लेकिन इसके बदले में समाज को क्या प्राप्त हुआ? क्या यह संस्था समाज को उदाहरण प्रस्तुत करने लायक कोई बच्चा प्रस्तुत कर सकी है? मतलब ये 50 करोड़ या तो व्यर्थ गए या फ़िर एक या कुछ लोगों की जेबों में गए। मात्र दिल्ली में ही इस तरह की 200 से अधिक संस्थाएं हैं जिन्होंने पिछले एक दशक में सैकड़ों करोड़ रुपये विदेशी या सरकारी सहायता के रूप में प्राप्त किए होंगे। इस अथाह धन का कहाँ किस तरह प्रयोग किया गया यह गंभीर जांच का विषय हो सकता है। संभवतः यह धन बाल कल्याण अथवा सामाजिक कल्याण की बजाय NGO संचालकों की जेबों में गया हो। समाज विरोधी राष्ट्र विरोधी लोगों और गतिविधियों में लगा हो। निश्चित ही बाल अधिकार, बाल कल्याण के नाम पर अपनी दुकानदारी चमकाने वाली बटर फ्लाइज जैसी संस्थाएं बेघर और कामकाजी बच्चों का कोई भला नहीं कर सकती हैं। ऐसे में सरकार और समुदाय (NCPCR और NCHR) अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं। सरकार, विशेष तौर पर उसका मंत्रालय "महिला एवं बाल विकास" हम बच्चों की समस्याओं से ज़्यादा दिनों तक मुँह नहीं मोड़ सकता। ये ऐसा नहीं कह सकते कि एनजीओ हम बच्चों के कथित कल्याण के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उसकी इन्हें जानकारी नहीं है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से हम बच्चे इतनी तो उम्मीद कर ही सकते हैं कि वे स्वयं संज्ञान लेकर ठोस और बदलावकारी पहल करे। हम आपसे अपील करते हैं कि -

(1) सरकार के स्तर पर ठोस, व्यावहारिक व उपयोगी पहल हो जिसके कार्यान्वयन में सरकार या मंत्रालय की अहम् भूमिका हो।

(2) बाल अधिकारों के नाम पर दलाली कर रहे बटरफ्लाइज जैसे संगठनों को बाल हितैषी कार्यक्रमों से दूर रखा जाए।

(3) बाल हितैषी कार्यक्रमों के योजना निर्माण में और उसके क्रियान्वयन में बच्चों के स्वर को अहमियत और स्थान दिया जाए।

(4) एनजीओ के क्रियाकलापों में पारदर्शिता लाने के लिए उनके सभी कार्यक्रमों को, चाहे वे गैर सरकारी अथवा विदेशी स्रोतों से ही क्यों न चलते हों, पारदर्शी बनाने के लिए जनसूचना क़ानून आर टी आई के दायरे में लाना चाहिए।

हमारी आपसे प्रार्थना है कि हमरे दुःख दर्द, तकलीफों के साथ संघर्ष में आपका योगदान हमारे लिए एक सहारा बनेगा जिससे हम अपने अंधकारमय वर्तमान को मिटाकर भविष्य को कुछ रोशन कर सकेंगे।

राजू (पूर्व अध्यक्ष, बाल मजदूर यूनियन ) मुजीब (सचिव, बाल मजदूर यूनियन)

बच्‍चे उन्‍हें बसंत बुनने में मदद देते हैं !