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Wednesday, June 11, 2008

एड्स पर स्वीकारोक्ति

एड्स एवं एचआईवी ये दो शब्द पिछले करीब दो दशकों से पूरी दुनिया को आतंकित करते रहे हैं। तथाकथित एचआईवी विषाणु से उत्पन्न होने वाले एड्स को लेकर इतना प्रचार हुआ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इतना व्यापक कार्यक्रम चलाया कि तमाम देशों को अपने स्वास्थ्य ढांचे में परिवर्तन करने को बाध्य होना पडा। पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा किसी एक बीमारी से जुड़े कार्यक्रम पर धन झोंका गया है तो वह एड्स है। हालांकि आरंभ से ही एड्स के भय को अनावश्यक करार देने वाले भी रहे हैं, पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई। अब अपने जीवन का एक बडा हिस्सा एड्स के विरूद्ध लड़ने में बिताने वाले डॉ। केविन डी. कॉक ने कहा है कि एचआईवी विषाणु से होने वाला खतरा बदल गया है। उनके अनुसार यह विषाणु अब केवल समलैंगिकों, नशाखोरों और वेश्याओं व उनके ग्राहकों तक सीमित हो गया है। एड्स को सबसे बड़ी महामारी मानने वालों में डॉ. केबिन अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिनकी भाषा बदली है, इसके सबसे बडे प्रचारक संयुक्त राष्ट्र ने ही कुछ महीने पहले कहा था कि विा भर में एचआईवी के मामले घटे हैं। उसने 4 करोड़ से घटकर 3 करोड़ 30 लाख होने का आंकडा भी दिया है। इन दोनों बातों में अभी भी एचआईवी एवं एड्स के खतरे को स्वीकार किया गया है। वास्तव में दुनिया भर में ऐसे लोग अब खड़े हो चुके हैं जो एचआईवी की कल्पना, उसके आधार पर बुनी गई बीमारी एवं उसकी संख्या की भयावह तस्वीर को पूरे मनुष्य समुदाय के लिए धोखाधड़ी करार दे रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र अभी भी जो आंकडा दे रहा है वह संदिग्ध है, क्योंकि ये आंकड़े उन एनजीआ॓ द्वारा जुटाए गए हैं जो कि एड्स के नाम पर करोडों का कार्यक्रम चलाते हैं। स्वयं भारत में ही यह साफ हो चुका है कि जितने एचआईवी संक्रमण की संख्या यहां दी गई उतनी है ही नहीं। जिस समय एड्स का नाम अस्तित्व में आया तब यह कहा गया था कि एशिया की आबादी ज्यादा होने के कारण वहां यह बड़ी महामारी होगी। इसमें भारत एवं चीन का नाम लिया गया था। हालांकि ये दोनों बातें गलत साबित हुईं, लेकिन इस बीच एशिया के देशों ने एड्स के नाम पर न जाने कितना धन खर्च किया। स्वयं भारत ने स्वास्थ्य मंत्रालय में अलग से राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन नाम से एक विभाग ही कायम कर दिया। भारत में काम की जो बातें पर्दे के पीछे थीं उसे विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों तक पहुंचा दिया गया। कंडोम के विज्ञापन को सामाजिक सेवा बना दिया गया। इससे नैतिक हानि हुई और सामाजिक मर्यादाएं ध्वस्त होने से परंपरागत व्यवस्था की चूलें हिल गयीं। बच्चों को विघालयों में सेक्स शिक्षा देने के पीछे सबसे बडा तर्क एड्स जागरूकता को ही बनाया गया। अब डॉ. केविन कह रहे हैं कि लोगों को जागरूक करने पर धन लगाने से ज्यादा जरूरी है कि खतरे की अधिक संभावना वाले क्षेत्रों को निशाना बनाया जाए। यानी जन जागरूकता के नाम पर जो कुछ किया गया वह व्यर्थ था। अगर एचआईवी वाकई है तो यह सेक्स के मामले में व्यभिचार करने वालों, खतरनाक नशे का सेवन करने वालों को हो ग्रसित करता है। भारत के आम आदमी को परंपरागत रूप से इतनी सीख मिली हुई है।
www.rashtriyasahara.com से साभार

Tuesday, May 13, 2008

फोर्ड फाउन डेशन : विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

दूसरा भाग (गतांक से आगे)

फोर्ड भारत में

फोर्ड फाउनडेशन की नई दिल्ली ऑफिस के वेब पेज के अनुसार -"भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर फाउनडेशन ने 1952 में भारत में एक ऑफिस की स्थापना की।" वास्तव में चेस्टर बाउल्स जो 1951 में भारत में अमरीका के राजदूत थे, ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। अमरीकी विदेश नीति की स्थापना में लगे बाउल्स को गहरा धक्का तब लगा जब 'चीन हाथ से निकल गया' (राष्ट्रीय स्तर पर वहां 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता में आ गए थे)। इसी तरह वे इस बात से भी दुखी थे कि तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए हथियारबंद आन्दोलन को कुचलने में भरतीय सेना नाकाम रही थी (1946-51) " जब तक कि कम्युनिस्टों ने स्वयं ही हिंसा का रास्ता बदल नहीं लिया। "भारतीय किसानों की अपेक्षा थी कि अंग्रेजी राज की समाप्ति के बाद उनकी इस दीर्घकालीन मांग को पूरा किया जाएगा कि जमीन जोतने वाले को मिलनी चाहिए। और यह दबाव तेलंगाना आन्दोलन की समाप्ति के बाद भी आज भारत में हर कहीं महसूस किया जा सकता है।

पॉल हॉफमैन को जो फोर्ड फाउनडेशन के तत्कालीन अध्यक्ष थे, बाउल्स ने लिखा-"स्थितियां चीन में बदल रही हैं पर यहाँ भारतीय परिस्थितियां स्थिर हैं.....अगर आने वाले चार-पाँच वर्षों में वैषम्य बढ़ता है , या फ़िर अगर चीनी भारतीय सीमाओं को धमकाए बगैर अपना उदारवादी और तर्कसंगत रवैया बनाये रखते हैं .... भारत में कम्युनिस्म का बड़ा भारी विकास हो सकता है। नेहरू की मृत्यु अथवा उनके रिटायरमेंट के पश्चात् यदि एक अराजक स्थिति बनती है तो सम्भव है यहाँ एक ताक़तवर कम्युनिस्ट देश का जन्म हो।" हॉफमैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए एक मज़बूत भारतीय राज्य की जरूरत पर बल दिया -"एक मज़बूत केन्द्र सरकार का गठन होगा , उग्र कम्युनिस्टों को नियंत्रित किया जाएगा....प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जनता तथा दूसरे स्वतंत्र (बीमार) देशों से तालमेल, सहानुभूति और मदद की अत्यन्त आवश्यकता है। "

नई दिल्ली ऑफिस फौरन स्थापित किया गया , और फोर्ड फाउन डेशन ने कहा- "यह अमरीका से बाहर फाउन डेशन का पहला कार्यक्रम है और नई दिल्ली ऑफिस इसकी क्षेत्रीय कार्रवाइयों का काफ़ी बड़ा हिस्सा पूरा करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र नेपाल और श्रीलंका तक व्याप्त है।

"फोर्ड फाउन डेशन की गतिविधियों का क्षेत्र तय कर दिया गया ( अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा) है "- जॉर्ज रोजेन लिखते हैं ,- " हमारा अनुभव है कि एक विदेशी (अमरीकी) सरकारी एजेंसी का ...................में काम करना अत्यन्त संवेदनशील मसला है .......दक्षिण एशिया बड़ी तेजी से फाउनडेशन की गतिविधियों के लिए एक संभावित क्षेत्र के रूप में सामने आया है.........भारत और पाकिस्तान दोनों ही चीन की ज़द में हैं और कम्युनिज्म द्वारा निशाने पर लिए हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए वे अमरीकी नीतियों के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गए हैं..... । " फोर्ड फाउन डेशन ने भारतीय नीतियों पर आधिपत्य जमा लिया है। रोजेन कहते हैं कि "1950 से लेकर 1960 के बीच विदेशी विशेषज्ञों ने भारतीयों के बनिस्बत उच्च अधिकार हासिल कर लिए हैं ", और फोर्ड फाउनडेशन तथा (फोर्ड फाउनडेशन/सी आई ए फंडेड) एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज "योजना आयोग के आधिकारिक सलाहकार" की तरह कार्य कर रहे हैं। बाउल्स लिखते हैं कि " डगलस एन्समिन्जर के नेतृत्व में , भारत में फोर्ड के कर्मचारी योजना आयोग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं जो पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन करता है। जहाँ भी दरार दिखती है , वे उसे भरते हैं, चाहे वह खेती का, स्वास्थ्य शिक्षा का अथवा प्रशासनिक मामला हो। वे ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण विद्यालयों में साथ जाते हैं, संचालन करते हैं और वित्तीय मदद देते हैं।"

Saturday, April 26, 2008

एनजीओ और दलितप्रश्न

यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के संदर्भ में जाति प्रथा सामंतवाद का महत्वपूर्ण तत्व है। सामंती तथा साम्राज्यवादी दोनों ताकतें अपने फायदे में जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं। सामंती ताकतें जाति व्यवस्था को धर्मों को आपस में तथा धर्म के भीतर वर्गों को आपस में लड़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। साम्राज्यवादी ताकतें दलित मुद्दे का इस्तेमाल उत्पीड़ित जनता को विभाजित करने में करती हैं। वे जाति व्यवस्था को अक्षुण्ण रखते हुए इसे पृथक पहचान रूप में रेखांकित करती हैं और आर्थिक उदारीकरण को सभी समस्याओं का हल बताती हैं।उत्पीड़क शासक वर्ग शोषितों की तुलना में बहुत ज्यादा वर्ग चेतन होते हैं क्योंकि उन्हें एक विशाल आबादी पर शासन करना होता है। ऐसा वे शोषित वर्गों को बांट कर तथा उनमें से कुछ को एनजीओ के माध्यम से रोटी का टुकड़ा फेंककर करते हैं। जो समुदाय जितना ज्यादा गरीब होता है, उनके लिए एनजीओ को उतना ही ज्यादा फंड आवंटित कराया जाता है। इसलिए दलित मुद्दे तथा दलितों के भीतर दलित औरतों के मुद्दे एनजीओ तथा अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ के लिए खूब बिकाऊ होते हैं। इन सभी योजनाओं का उद्देश्य दलितों के वर्गीय चेतना को कुंद करने के लिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनसे दूर रखना होता है। ऐसा करने के उनके विभिन्न तरीके हैं।दलितों को ब्राह्मण-विरोधी, मनु-विरोधी तथा ओबीसी-विरोधी के रूप में इतना ज्यादा प्रचारित किया जाता है कि दलित पहचान संकीर्णतावादी चरित्र ग्रहण कर लेता है। ब्राह्मण संस्कृति से लड़ने के नाम पर वह दलित ब्राह्मणवाद व्यवहृत करने लगता है जिसके तहत अपनी पहचान खोने के डर से दलित स्त्री -पुरूषों को दूसरी जातियों, धर्मों तथा समुदायों में विवाह करने से रोकते हैं। उत्पादन संबंधों एवं दलितों-गैर-दलितों के बीच सांस्कृतिक संबंधों के सामंती चरित्र पर चोट करने की जगह राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ गैर-दलितों के साथ झगड़ों से बचने के नाम पर अलग पानी का नल, मंदिर, समुदायिक भवन आदि बनाकर उनके अलगाव को और ज्यादा बढ़ावा देते हैं। दलितों में एकता मजबूत करने के लिए विभिन्न दलित जातियों का जमात बनाने की जगह वे अलग-अलग दलित जाति का अलग संगठन बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और फिर ज्यादा-से-ज्यादा फंड पाने के लिए उनमें प्रतियोगिता पैदा करते हैं। इसका परिणाम होता है कि अपेक्षाकृत शिक्षित और उन्नत दलित जातियां ज्यादा फंड पाने में सफल होती हैं, जिससे दलितों के बीच विभाजन होता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मध्यवर्गीय अवसरवादी दलित नेता भी तैयार किये जाते हैं जिनका इस्तेमाल संसदीय राजनीति के तहत वर्गीय शासन को चलायमान रखने के लिए किया जाता है।कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ हिन्दू फासिस्टों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे भी भड़काते हैं। भारत में गुजरात के गोधरा में २००२ में हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो दंगे हुए वह इसका एक उदाहरण है। ऐसा पाया गया कि कई हिन्दू फासिस्ट एनजीओ दलित पहचान के संकट को उनमें मुसलमानों से भय तथा उनके खिलाफ हिंसा करने के लिए प्रेरित करने में इस्तेमाल करते हैं।

सीपीएन (माओवादी) के मुखपत्र "वर्कर" की लेखमाला "जन युद्ध और दलित प्रश्न" के जन विकल्प द्वारा अनूदित एवं प्रकाशित आलेख से कुछ अंश साभार

Friday, April 4, 2008

पोलियो अभियान के सबक

शुक्रवार, 19 जनवरी, 2007
डॉ. जेकब पुलियन
अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि राष्ट्रीय पोलियो उन्मूलन अभियान योजना के मुताबिक नहीं चल पाया है । हममें से कई लागों ने इसे सफल बनाने में दिन-रात एक कर दिए । पोलियो (जो कि मूलत: पानी और स्वच्छता से सम्बंधित समस्या है) पर काबू में करने में बार-बार ओरल (मुंह से दिये जाने वाले) पोलियो टीके के जादुई नुस्खे की नाकामी काफी हद तक पूर्व अनुमानित ही थी । मगर इसके कारण हमारी मायूसी कम नहीं हो जाती । इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन की टीकाकरण उपसमिति में इस बात पर काफी बहस हुई कि इस प्रयास की असफलता की बात को सार्वजनिक किया जाए या नहंी । अंतत: अगस्त २००६ में उपसमिति ने फैसला किया कि इस बात को सार्वजनिक करना उसका फ़र्ज है ।
सार्वजनिक करना जरुरी -
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष डॉ। पुष्पा भार्गव ने १९९९ में यह लेख लिखा था- फाइटिंग दी पोलियो वायरस । यह लेख हिंदू के १२ दिसम्बर १९९९ के अंक में प्रकाशित हुआ था। १९८८ में डॉ. भार्गव एक बैठक में शरीक हुए थे जहां यह फैसला हुआ था कि भारत में पोलियो के इंजेक्शन टीके का उपयोग किया जा चाहिए क्योकि ओरल पोलियो टीके की कारगरता कम है । पोलियो का इंजेक्शन टीका बनाने के लिए गुड़गांव में एक कारखाना भी स्थापित किया गया था। चार वर्षों के बाद १९९२ में , विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह पर इस योजना को ठंडे बस्ते मंे डाल दिया गया और ओरल पोलियो टीका इस्तेमाल करने का निर्णय ले लिया गया । डॉ. भार्गव ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव , स्वास्थ्य मंत्री तथा स्वास्थ्य सचिव को कई पत्र लिये । डॉ. भार्गव उस निर्णय में शरीक थे जिसमें कहा गया कि ओरल पोलिया टीका भारत के लिये अनुपयुक्त है । लिहाज़ा उन्होंने यह जानना चाहा था कि किन प्रमाणों के आधार पर सरकार ने ओरल टीके का उपयोग करने का निर्णय लिया है । उन्हेांने यह भी जानना चाहा था कि इण्डियन वेक्सीन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने इंजेक्शन टीका उत्पादन के लिये जो ५० करोड़ रुपए का निवेश किया है उसका क्या औचित्य रह जाएगा । उनके पत्रों के जवाब नहीं दिए गए । अंतत: उन्होंने एक लेख लिखा । अपने लेख में उन्होंने निष्कर्ष स्वरुप कहा था- यदि निर्विवाद रुप से यह बताया जा सके कि ओरल पोलियो टीका कारगर रहा है, तो सबसे ज्यादा खुशी व तसल्ली मुझे मिलेगी । बदकिस्मती से आज उपलब्ध प्रमाण इस मत के विरुद्ध जाते हैं । इसलिए संभावना यही दिखती है कि कीमती समय और धन गंवाने के बाद पोलियो की नियति वही होगी जो बीसीजी (टीबी के टीके) की हुई थी। आने वाले दिनों के घटनाक्रम ने इस वक्तव्य की सत्यता को साबित किया है ।
सार्वजनिक जवाबदेही-
उक्त लेख का शुक्र है कि हमारे पास कुछ लिखित इतिहास मौजूद है । ज़रुरत सार्वजनिक जवाबदेही की है और यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन के बेशक्ल अफसरों पर और भारत सरकार के उन अधिकारियों पर भी लागू होती है जिनका ज़िक्र उस लेख में हुआ था । यह तो संभव है कि विवेक के आधार पर लिए गए निर्णय गलत हो सकते हैं मगर जब तक इस बात को स्वीकार नहीं किया जाता तब तक हम ये गलतियां बार -बार दोहराते रहेंगें ।
इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन की उपसमिति के सामने भी वही दुविधा थी जो डॉ. भार्गव के सामने थी । उपसमिति वेक्सीन - प्रेरित पोलिया के मामलों की बढ़ती संख्या (पिछले साल १६००) से चिंतित थी। ये मामले पोलियो टीके की बार-बार दी जाने वाली खुराकों के कारण सामने आ रहे थे । इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह थी कि २७००० बच्चे पोलियोनुमा लकवे के शिकार हुए थे जिनमें मल में पोलियो वायरस का संवर्धन नहंी हुआ था । सरकार तो यह जांच करवाने को भी तैयार नहीं थी कि इन बच्चों में से कितनों में अपंगता शेष रही थी। इस बात के पुख्ता प्रमाण थे कि कई ऐसे बच्चों को पोलियोजनित लकवा हो रहा है जिनका टीकाकरण हो चुका है । इससे जाहिर था कि टीका कारगर नहीं है । जब अफसरशाही ऐसी हो जो समस्या के वजूद को भी मानने से इंकार करे, तो उपसमिति के सामने इस मखौल का भंडाफोड़ करने के अलावा काई चारा न था ।
यह अच्छी बात है कि इस सरकार ने खबरची को बुरा-भला कहने और इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन को नीचा दिखाने के प्रयास शुरु नहंी किए । मगर बदकिस्मती से सरकार की प्रतिक्रिया यह रही कि उसने एक और कार्यक्रम शुरु कर दिया है जो इस स्थिति को सुधारने के बजाए और बिगाड़ेगा ।इस लेख का समापन हम इस तरह के हवाई किले से बचने का उपाय सुझाने के साथ करेंगें ।
बड़े मुद्दों पर जाने से पहले पाठक शायद उस बीमारी को समझना चाहें जिसके कारण यह गोरखधंधा शुरु हुआ था । पोलियो एक वायरस है जो लकवा पैदा कर सकता है । यह वायरस आंतों में पलता बढ़ता है और दूषित पानी के माध्यम से फैलता है । पानी और शौच व्यवस्था की स्थिति में सुधार से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकताह । इसके अलावा सामान्य टीकाकरण से इसके उन्मूलन में मदद मिलेगी। सामान्य टीकाकरण के साथ पोलिया नियंत्रण कार्यक्रम बढ़िया चल रहा था । १९८८ में पोलियो का प्रकोप २४००० था जो १९९४ में घटकर ४८०० रह गया था । यह पल्स पोलियो शुरु होने से बहुत पहले की बात है ।
१९९८ में विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाआें ने पोलियो टीका बार-बार पीलाकर दुनिया भर में इस बीमारी का सफाया करने की योजना लागू की । शुरुआती फंडिंग, करीब ४०० करोड़ रुपए, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (रोटरी अंतर्राष्ट्रीय समेत) से आया था । यह तो जैसे अपरिहार्य था कि कार्यक्रम शुरु होने के दो साल बाद इन संस्थाआें ने दानदाता थकान (डोनर फटीग) की दुहाई देकर फंडिंग बंद कर दिया । पिछले वर्ष भारत सरकार ने इस कार्यक्रम पर १००० करोड़ रुपए खर्च किए थे । शेष समस्त टीकाकरण (पांच बीमारियांे के लिये) पर खर्च ३०० करोड़ रहा। यह विदेशी फंडिंग काएक पेटर्न सा है ।
अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग मिल रही हो और सरकार अपने लोगों के लिए पेश किए जा रहे दान को लेने से इंकार करे तोयह बेवकूफी सी नजर आती है । एक बार विदेशी फंडिंग के आधार पर कार्यक्रम शुरु होन जाने पर विदेशी सहायता रोक दी जाती है ।गरीब देश इस चाल में फंस जाते हैं और बगैर जरुरी लाभ-लागत आकलन के ही टीके देना शुरु हो जाता है ।
हम नहंी जानते कि विदेशी फंडिंग की पेशकश ने इस निर्णय पर कितना असर डाला था मगर तथ्य यह है कि परिणाम यह रहा कि भारत सरकार को एक ऐसे कार्यक्रम के लिए अभूतपूर्व वित्त व्यवस्था करनी पड़ी है, जिसकी नाकामी तय थी ।
सबक नहीं सीखे गए
मगर दु:ख की बात यह है कि हमने अपनी गलतियों से कोई नसीहत नहीं ली है । ओरल पोलियो टीके पर आधारित पोलियो उन्मूलन रणनीति के नाकाम रहने के बाद सरकार ने एक और विदेशी पेशकश स्वीकार कर ली है जिसमें उच्च प्रकोप वाले क्षेत्रों के लिये इंजेक्शन टीका मुफ्त दिया जाएगा ।
यह आयातित इंजेक्शन टीका ओरल टीके से २५ गुना ज़्यादा महंगा है। लगभग अवसान (एक्सपायरी) की तारीख वाले टीकों की एक खेप मुफ्त दी जा रही है मगर हम अपना राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम इसके आधार पर तो नहीं चला सकते । इसके अलावा इस टीके को घर-घर जाकर लगाने की लागत भयावह होगीं यदि यह पैसा उन क्षेत्रों में पेयजल व शौच व्यवस्था को सुधारने में लगाया जाए तो इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है । इंजेक्शन टीका सब बच्चों को देना जरुरी होगा । जब हम ओरल टीका शत प्रतिशत बच्चों को नहीं दे सके हैं, तो इंजेक्शन का प्रतिशत तो और भी कम रहेगा । यानी एक बार फिर असफलता शर्तिया है ।
दरअसल, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की उपसमिति ने सुझाव दिया है कि सरकार इस पूरे अभियान को थोड़ा धीमा करे और सामान्य टीकाकरण को सुदढ़ करने के अलावा प्रभावित क्षेत्रों में पानी व शौच व्यवस्था में सुधार के कदम उठाए । टीकों को शामिल करने या न करने के बारे में पेचीदा निर्ण तक पहुंचने के लिए हमें कोई स्थायी व्यवस्था बनानी होगी । यह व्यवस्था यू.के. के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल एक्सलेंस जैसी कोई स्वतंत्र संस्था हो सकती है । स्वास्थ्य पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों, स्वास्थ्य के अर्थशास्त्रियांे और जनप्रतिनिधियों की एक पेशेवर संस्था बनाई जानी चाहिए । सरकार विचाराधीन टीके का प्रचार करे । मरीजों के समूह, स्वास्थ्य पेशेवर, अकादमिक संस्थान, टीका उद्योग, ट्रेड यूनियन्स और विश्व स्वास्थ्य संगठन व ग्लोबल वेक्सीन इनिशिएटिव जैसे सारे हितधारी अपने-अपने हित सामने रखें ।
उक्त संस्था को टीके से संबंधित चिकित्सकीय प्रमाण और उसके लाभों के आर्थिक पक्ष का आकलन करके दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करना चाहिए, जिसका आकलन सारे पंजीकृत हितधारी और एक नागरिक परिषद द्वारा किया जाना चाहिए । इनकी राय के आधार पर निकाय को दिशानिर्देशों में संशोधन करना चाहिए। अंतत: एक स्वतंत्र पैनल को इन्हें देखकर यह तसल्ली कर लेना चहिए कि सारे हितधारियों के हितों को इनमंे स्थान मिल गया है । इसके बाद अंतिम दिशानिर्देश जारी किए जाएं ताकि सरकार को निष्पक्ष सलाह मिल सके जिसके आधार पर वह निर्णय कर सके ।
पर्यावरण डाइजेस्ट से साभार

Monday, March 31, 2008

एचआईवी: आओ मिलकर एड्स भगाएं

लेख़क - अभिषेक श्रीवास्तव
Sunday, 30 December 2007
एचआईवीएड्स के लिए आ रहे भारी विदेशी अनुदान के लालच में हम इससे ज्यादा खतरनाक व जानलेवा बीमारियों से बचने के उपायों और योजनाओं से विमुख होते जा रहे हैं।क्या आपने पुरुषोत्तमन मुलाली का नाम सुना है? आप जैक के बारे में क्या जानते हैं? जाहिर तौर पर एचआईवीएड्स पर बात करते वक्त ऐसे सवाल घोर अप्रासंगिक जान पड़ेंगे। आप सोचेंगे कि एचआईवीएड्स के क्षेत्र में तो बिल गेट्स से लेकर क्लिंटन और देसी नामों में नाको से लेकर अंजलि गोपालन की किस्में पाई जाती हैं। अगर यूएसएड्स और यूएनएड्स की बात न की जाए तो एड्स पर कोई भी विमर्श अधूरा ही रहेगा। लेकिन शुरुआत एक ऐसे नाम से जिसका कोई अता-पता नहीं है। जी हां, वास्तव में मीडिया की एड्स से जुड़ी तमाम खबरों में यह नाम गुमनाम है। इसी व्यक्ति ने हमें बताया कि इस महीने कर्नाटक में एचआईवीएड्स के भ्रामक आंकड़ों के खिलाफ प्रचार करने और सरकार का विरोध करने वाली एक एचआईवी संक्रमित महिला आंदोलनकारी की हत्या हो गई है। इस महिला ने अपने पीछे 600 एचआईवी संक्रमित महिलाओं को संगठित किया था जो सरकार द्वारा जुलाई में जारी एचआईवीएड्स के आकड़ों की सचाई का पर्दाफाश कर रही थीं।
सवाल उठता है कि ऐसी खबरें हम तक क्यों नहीं आ पाती हैं? इसका कारण पुरुषोत्तमन खुद बताते हैं, 'जाहिर सी बात है कि जो लोग विदेशी अनुदान लेकर एड्स के आंकड़ों को तोड़ते-मरोड़ते हैं, उनके हित बड़ी पूंजी से चलने वाले मीडिया के हितों से जुदा नहीं हैं। दूसरे, न तो मीडिया को और न ही एड्स जागरूकता का दम भरने वाले तमाम एनजीओ और अन्य कार्यकर्ताओं को कोई भी वैज्ञानिक जानकारी है कि एड्स के आंकड़े कैसे निकाले जाते हैं? और यह भी कि आखिर एड्स होता क्या है। जो बताया जाता है उसे मान कर आम सहमति बना लेने की आदत ने इस देश को सौ फीसद बेच डाला है।'आखिर इस शख्स की बातों में कितनी सचाई है? पहले बता दें कि पुरुषोत्तमन मुलाली देश के उन शुरुआती लोगों में से एक हैं जिन्होंने 1986-87 के दौरान भारत में एड्स के आरंभिक मामले सामने आते ही इस पर चिंता जाहिर करते हुए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने यह शुरुआत ज्वाइंट एक्शन काउंसिल कुन्नूर (जैक) नाम के संगठन से की और आज भी इसी बैनर तले काम जारी रखे हुए हैं। आज एचआईवीए्ड्स के क्षेत्र में जितने चेहरे दिखाई दे रहे हैं सब पुरुषोत्तमन की अगली पीढ़ी के लोग हैं। वह बताते हैं, 'मेरी भी दुकान अच्छी चल रही थी। एड्स के नाम पर सालाना पांच करोड़ का कारोबार था। लेकिन जब मैं इस तंत्र के भीतर घुसा और मैंने देखा कि किस तरह विदेशी अनुदानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे के लिए आकड़ों को मनमर्जी तोड़ा-मरोड़ा जाता है और एक बीमारी के बारे में इतने अवैज्ञानिक नजरिए से प्रचार किया जा रहा है तो मैंने दुकान बंद कर दी। कहते हुए शर्म आती है कि मैं पहला और इकलौता व्यक्ति हूं जो एचआईवीएड्स की राजनीति का पर्दाफाश करने के लिए पिछले दस वर्षों से लगा हूं। मेरी जेब में एक पैसा नहीं है लेकिन मैं इन लोगों को छोड़ूंगा नहीं।'
गौरतलब है कि 6 जुलाई 2007 को राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यम के तीसरे चरण का उद्धाटन करते वक्त स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने बड़े उत्साह के साथ घोषणा की थी कि भारत में एक आकलन के मुताबिक एचआईवी ग्र्रस्त लोगों की संख्या में नाटकीय तरीके से गिरावट आई है। उन्होंने कहा था कि पहले के आंकड़े 57 लाख से गिर कर यह संख्या अब 20 लाख तक पहुंच गई है और प्रसार की दर 0.9 फीसद से गिर कर 0.36 फीसद हो गई है। पुरुषोत्तमन हंसते हुए सवाल करते हैं, 'या तो 37 लाख लोगों की मौत हो गई या वे ठीक हो गए। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं हो सकता कि सरकार ऐसे दावे करे।' सरकार का जवाब यह आता है कि इस बार आंकड़ों के आकलन के लिए अपनाई गई प्रणाली को बदल दिया गया है जिससे इतना फर्क दिखाई दे रहा है। रामदास ने खुद कहा था, 'हमने इस आपदा की गंभीरता को कम कर के आंकने की गलती हमेशा से ही की है।' उन्होंने चेतावनी दे डाली कि दोनों वर्षों के आंकड़ों की तुलना संभव नहीं है। उनका कहना था कि यदि हम दोनों ही वर्षों के लिए एक ही प्रविधि अपनाते हैं तो पाते हैं कि प्रसार में न्यूनतम फर्क पड़ा है।
सवाल उठता है कि दो वर्षों में आंकड़े निकालने की प्रविधि को क्यों बदल दिया गया? खैर, निष्कर्ष यही निकलता है कि एचआईवी के मामलों में वास्तव में कोई कमी नहीं आई है। इस तथ्य से हालांकि एचआईवीएड्स पर काम करने वाले कई कार्यकर्ता खुद सहमत हैं लेकिन अनुदानों का इतना दबाव है, खासकर वे अनुदान जो नाको के माध्यम से आते हैं, कि इस क्षेत्र में काम कर रहे लोग और संगठन इसके कारणों की तह में नहीं जाते हैं। सरकार ने अब तक नई प्रविधि का कोई भी विवरण मुहैया नहीं कराया है कि आखिर कैसे वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि संक्रमित व्यक्तियों की संख्या कम हो गई है। दूसरा पक्ष यह भी है कि तमाम एनजीओ इस बात को लेकर सशंकित हैं कि सरकार के इन आंकड़ों से कहीं अनुदानों पर कोई फर्क न पड़ जाए। जाहिर सी बात है कि यदि दानदाता एजेंसियां सरकारी आंकड़ों से सहमत हो जाती हैं तो अनुदानों में कमी आना तय है।
गैरसरकारी संगठनों द्वारा ये चिंताएं भी जताई जा रही हैं कि संशोधित आंकड़ों से बड़ी दवा कंपनियों द्वारा अनिवार्य एड्स दवाओं का पेटेंट कराने की संभावना बढ़ जाती है। पुरुषोत्तमन कहते हैं, 'यदि एक फीसद से ज्यादा आबादी एचआईवीएड्स से प्रभावित होती तभी इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जा सकता है। सरकार खुद कहती है कि 0.9 फीसद आबादी अभी इसकी चपेट में है। फिर इस पर एक राष्ट्रीय विधेयक बनाने की जरूरत क्यों आन पड़ी?'
ध्यान देने वाली बात है कि पिछले वर्ष सरकार संसद में एचआईवीएड्स विधेयक 2006 लाने वाली थी जिसके खिलाफ काफी बवाल मचा था। इस मामले में 'जैक' द्वारा राष्ट्रपति और राज्य सभा के महासचिव को एक पत्र भी लिखा गया था। जबकि इस संबंध में दिल्ली के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आईपीसी की धारा 377 के तहत दो मामले 2001 से ही लंबित हैं। इसके अलावा संसद के समक्ष एक याचिका डाली गई थी जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि एचआईवीएड्स पर बनाई गई संसदीय समिति दरअसल यूएनएड्स से संबध्द इकाई है। जाहिर तौर पर यूएनएड्स पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा है और वहां चीजें स्वतंत्र रूप से संचालित नहीं होती हैं।
इसी बारे में पुरुषोत्तमन कहते हैं कि बल्ब इस देश में जलता है लेकिन उसका स्विच कहीं और होता है। यह बात दूसरी तमाम विकास परियोजनाओं के बारे में भी उतनी ही सच है जितना एचआईवीएड्स से जुड़ी परियोजनाओं के बारे में। सोचने वाली बात है कि जिस देश में टीबी, हैजा, मलेरिया, डेंगू, खसरा, कैंसर आदि से लोग इतनी आसानी से रोजाना मर-खप जाते हैं वहां एचआईवीएड्स को इतना तूल दिए जाने का क्या अर्थ है? टीबी, मलेरिया और एचआईवीएड्स पर भारत को मिलने वाले वैश्विक अनुदानों की तुलना की जाए तो इस बात को अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि इनके बीच कितना भारी अंतर है। यह संयोग नहीं है कि 'नाको' की वेबसाइट पर प्रकाशित रिक्त पदों में एक कम्प्यूटर ऑपरेटर का वेतन मासिक 75000 दिखाया गया है। और यह स्थिति उस देश में है जहां 70 फीसदी आबादी की औसत कमाई एक डॉलर (41रुपए) प्रतिदिन से नीचे है।
इस वर्ष के आल्टरनेटिव इकोनॉमिक सर्वे पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि देश में जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितना पैसा खर्च किया जाना चाहिए उतना या उससे ज्यादा सिर्फ एक बीमारी के लिए खर्च किया जा रहा है। ग्रामीण संस्थाओं में चिकित्सकों और चिकित्सकीय कर्मचारियों के वितरण का यह हाल है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक 90 फीसद से ज्यादा समय मौजूद नहीं रहते हैं। एक प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ एक चिकित्सक की व्यवस्था है। सरकारी आंकड़े खुद बताते हैं कि 50 फीसदी पुरुष स्टाफ, 21 फीसदी नसर्ें (एएनएम), 34 फीसदी प्रयोगशाला कर्मी और 34 फीसदी फार्मासिस्ट आम तौर पर अपने कार्य स्थलों से गायब रहते हैं। एक बात और ध्यान देने वाली है कि मानव संसाधन यदि पर्याप्त हो भी तो ग्रामीण इलाकों में चिकित्सीय उपकरणों की संख्या का टोटा है।
यदि हम स्वास्थ्य सूचकों पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिशु मृत्यु दर, मलेरिया, हैजा जैसे सांमक रोगों का प्रसार खराब ढांचागत व्यवस्था के बावजूद घटा है। इससे सीधा सबक मिलता है कि जो पैसा निजी क्षेत्र में या गैरसरकारी संस्थानों के माध्यम से निवेश किया जा रहा है उसे अगर सार्वजनिक क्षेत्र और जन स्वास्थ्य में लगाया जाए तो स्थितियों के सुधरने की संभावनाएं बढ़ना लाजिमी है। हालांकि सवाल उठाए जाते रहे हैं कि पिछले दो दशकों के दौरान स्वास्थ्य सूचकों में आया सुधार निजी क्षेत्र की बढ़त की वजह से है या सार्वजनिक क्षेत्र की बेहतरी की वजह से। हम आज ऐसी खबरों से रूबरू होते हैं कि मेरठ जैसे शहर में एक एचआईवी रोगी का इलाज करने से चिकित्सक मना कर देते हैं। एम्स जैसे संस्थान में एक मरीज समुचित व्यवस्था न होने के चलते उसके गलियारों में ही दम तोड़ देता है और उसकी लाश को उसके गांव पहुंचाने वाला कोई नहीं होता। उस पर से बर्बर व असंवेदनशील मीडिया इस लाश का ऐसे प्रचार करता है जैसे संवाददाता का इस मौत से कोई संबंध नहीं है।
अन्य बीमारियों को यदि कुछ समय के लिए हम अलग रख दें तो एचआईवीएड्स के साथ एक पक्ष जो बहुत मजबूती से जुड़ा नजर आता है वह सामाजिक विभेद और कलंक का है। आम तौर पर हमारे यहां एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। इस दिशा में जागरूकता फैलाने के लिए हालांकि कई गैरसरकारी संगठन और सरकारी एजेंसियां कार्यरत हैं लेकिन इसमें भी जो अनुदान प्राप्त होता है वह बुनियादी तौर पर सामंती मानसिकता के खिलाफ इस पूरी लड़ाई को प्रोजेक्ट में बदल कर रख देता है। दिल्ली से ही चलने वाली एक संस्था 'सम्यक' के संजय देव और वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव इस संस्था के माध्यम से पिछले कई वर्षों से मीडियाकर्मियों के बीच एचआईवीएड्स को लेकर जागरूकता फैलाने के काम में लगे हैं। इस बीमारी से जुड़ी शब्दावली के अखबारी खबरों में प्रयोग को लेकर कई शहरों में संवाददाताओं और पत्रकारों के साथ कार्यशालाएं की जा चुकी हैं और उन्हें बताया जाता है कि किस तरह से ऐसी भाषा का प्रयोग करें जो असम्मानजनक न हो। हालांकि इस भाषा के बारे में एनजीओ की पुस्तकों के बड़े प्रकाशक विनय आदित्य बहुत स्पष्ट राय रखते हैं, 'यह भाषा सीधे विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र से आ रही है। ऐसा लगता है जैसे कि अंग्रेजी का हिंदी में तर्जुमा कर दिया गया हो। लोगों को ध्यान ही नहीं रहता कि हिंदी में कितने खूबसूरत शब्द हैं जिन्हें वापस लाया जाना चाहिए।' सलन, आजकल एचआईवी से ग्रस्त मरीजों के लिए एक शब्द चल पड़ा है 'एचआईवी के साथ जी रहे व्यक्ति।' अब यह नाम भले ही संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार कर्मियों के बीच सम्मानित माना जाता हो लेकिन लिखने और पढ़ने में काफी अटपटा लगता है। भले ही इस तरह की शब्दावली के पैरोकार अपने तर्क दें लेकिन मोटे तौर पर इस संदर्भ में एक बार फिर पुरुषोत्तमन मुलाली की बात मार्के की लगती है, 'एचआईवीएड्स कोई बीमारी नहीं है। यह एक पूरी सभ्यता है। इसीलिए अन्य बीमारियों की तुलना में एचआईवीएड्स को आने वाला अनुदान इतना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह हमारी भाषा, संस्कृति और जीने की शैली पर सीधे हमला करता है।' तमाम किस्म के दावों, आंकडों और भय के बीच पुरुषोत्तमन के बेलाग बयान हमें ज्यादा आकर्षित करते हैं। जाहिर सी बात है कि हम भी एचआईवीएड्स के भीतरी दांव-पेंचों से तकनीकी तौर पर इतने वाकिफ नहीं लेकिन कहा गया है कि धुआं है तो आग भी कहीं होगी ही। पुरुषोत्तमन हमारे सामने बगैर कोई खुलासा किए सिर्फ इतना ही कहते हैं, 'यह आग आपको मार्च-अप्रैल में दिखाई दे जाएगी। सारे खेल का पर्दाफाश होने में कुछ ही वक्त बाकी है। मैं इसी में लगा हूं।' हम हतप्रभ उनका मुंह देखते रह जाते हैं।


समकाल डॉट कॉम से साभार

Friday, March 14, 2008

एड्स नियंत्रण का अनकहा सच

(एड्स नियंत्रण के नाम पर इस देश में जितने बड़े पैमाने पर गोरखधंधा चल और फल-फूल रहा है इसकी दूसरी कोई मिसाल शायद ही ढूँढने पर मिले। यह किस्सा इस वक़्त के बहुचर्चित ब्लॉग मोहल्ला पर तीन किस्तों में आया था। दिलीप मंडल के इस रहस्योद्घाटन को हम यहाँ आभार सहित रख रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लोग साम्राज्यवाद प्रायोजित प्रचार के घटाटोप में सच देख नहीं पा रहे।)

गन्दा है पर धंधा है ये
दिलीप मंडल
( एड्स खतरनाक बीमारी है। इस बात को आप अपने निजी अनुभव, आस-पास रिश्तेदारी, दोस्तों, मोहल्ले, कस्बे, अपार्टमेंट में होने वाली मौतों से बेशक महसूस न कर पाएं, लेकिन सरकार से लेकर तमाम एनजीओ और विश्वभर की संस्थाएं आपको यही समझाने की कोशिश कर रही हैं। आइए जानते हैं कुछ तथ्यों के बारे में। ये सारे तथ्य भारत सरकार ने संसद में लिखित रूप में रखे हैं। ये सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े है। इन सबके लिंक दे रहा हूं, ताकि निष्कर्ष पर विवाद हो तो भी स्रोत सामग्री की विश्वसनीयता बनी रहे। - दिलीप मंडल)

एड्स से भारत में हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार कहती है कि 2004-5 में 1678, 2005-2006 में 1624 और 2006-2007 में 1786 लोग एड्स की वजह से मौत के शिकार हुए। स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये आंकड़ा 7 सितंबर 2006 को संसद में पेश किया। ये उस सरकार के नतीजे हैं जो एड्स को देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या मानती है और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में जिस एक बीमारी का जिक्र है वो एड्स ही है।टीबी और कैंसर से हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार ने संसद को बताया है कि कि हर साल 18 लाख से ज्यादा लोगों को टीबी होता है और साल में 3 लाख 70 हजार से ज्यादा लोग टीबी से मरते हैँ। दुनिया में टीबी के कुल केस का 20 परसेंट सिर्फ भारत में दर्ज होता है। यानी दुनिया में टीबी का हर पांचवां मरीज भारतीय है।कैंसर की बात करें तो आईसीएमआर के जरिए राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री में हर साल 7 से 9 लाख नए कैंसर मरीजों के मामले हर साल दर्ज होते हैं और हर साल 4.4 लाख लोग कैंसर से मरते हैं। कैंसर भारत में मौत की चौथी सबसे बड़ी वजह है। ये आंकड़े आप संसद की साइट पर देख सकते हैं।

एक मौत 1.29 करोड़ रुपए की और दूसरी मौत 3,181 रुपए की
(मौत को रुपए में आंकने से बुरी बात क्या हो सकती है। लेकिन बात इतनी कड़वी है कि इसे मीठे अंदाज में पेश करना मुश्किल है। बात एड्स के अर्थशास्त्र और राजनीति की हो रही है। एड्स सचमुच एक अद्भुत बीमारी है। इसे लेकर पढ़ने बैठा तो जानकारियों को पिटारा खुलता चला गया। आप भी इस चर्चा में हिस्सेदार बनें। आखिर ये आपकी सेहत का मामला है - दिलीप मंडल)


पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए। आपको एड्स न हो जाए, इसके लिए ये रकम पांच साल में खर्च की जाएगी। पैसा सरकार भी खर्च कर रही है और दुनिया भर से बरस भी रहा है। और देश में मची है इस पैसे की लूट। इस लूट में कई हिस्सेदार हैं। लूट तो देश-दुनिया में और भी कई किस्म की हो रही है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश में जहां 30-40 रुपए के आयरन टैबलेट न मिलने के कारण न जाने कितनी गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे दम तोड़ देते हैं, वहां ये लूट मानवता के खिलाफ अपराध है। देखिए एड्स के लिए आ रहे पैसे का ऑफिशियल लेखाजोखा :बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन से आएंगे 1425 करोड़ रुपए।ग्लोबल फंड टू फाइड एड्स, ट्यूबरकलोसिस एंड मलेरिया से मिलेंगे 1787 करोड़ रुपए।वर्ल्ड बैंक देगा 1125 करोड़ रुपए।डीएफआईडी से आएंगे 862 करोड़ रुपए।क्लिंटन फाउंडेशन ज्यादा पैसे नहीं दे रहा है, वहां से आएंगे 113 करोड़ रुपए।यूएसएड से 675 करोड़ रुपए आ रहे हैं।यूरोपियन यूनियन को भी भारत के एड्स पीड़तों से हमदर्दी है और वो 77 करोड़ रुपए दे रहा है।संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग एजेंसियों 323 करोड़ रुपए दे रही हैं।दूसरे विदेशी स्रोतों से 741 करोड़ रुपए आ रहे हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार से मिलने वाले 450 करोड़ रुपए शामिल हैं।भारत सरकार के बजटीय आवंटन को जोड़ दें तो ये रकम हो जाती है 11,585 करोड़ रुपए।ये वो रकम है जो पांच साल के राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम फेज-3 पर खर्च होनी है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के एक प्रेजेंटेशन के पेज 44-45 पर आप पूरा हिसाब देख सकते हैं। संसद की साइट पर भी विदेश से आने वाले पैसे का हिसाब किताब आपको इस लिंक पर दिखेगा। वैसे ये तो सीधा साधा हिसाब हैं वरना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी फोकस एड्स पर ही कर दिया गया है।

कंडोम बांटते एनजीओ और एड्स का कारोबार
(पिछली दो पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह एड्स से साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है, लेकिन एड्स से लड़ने के नाम पर आने वाला पैसा लगातार बढ़ता जा रहा है। आपने ये भी पढ़ा कि एड्स की एक मौत को टालने पर सवा करोड़ रुपए खर्च होते हैं जबकि कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली मौत से निबटने के लिए औसत खर्च 3181 रुपए है। पैसा किन स्रोत से आ रहा है इसकी भी बात हो चुकी है। अब जानते हैं ये पैसा जा कहां रहा है। - दिलीप मंडल)एड्स के नाम पर आ रहे अंधाधुंध पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा (73%) खर्च किया जा रहा है लोगों को अवेयर बनाने के लिए। यानी पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़ नाटक, बुकलेट, विज्ञापन आदि पर। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को दिए प्रेजेंटेशन में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नैको ने बताया है कि एड्स जागरूकता के विज्ञापन 2006 में 19,250 बार टेलीविजन चैनलों पर दिखाए गए।इसी प्रेजेंटेशन में बताया गया है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत 2007 से 2012 के बीच सरकार देश में 2031 करोड़ रुपए के कंडोम बांटेगी। ये रकम तो सिर्फ एनएचआरएम के तहत कंडोम खरीदने पर खर्च होनी है। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) का खर्च इससे अलग है। एनएसीपी के तहत देश में कंडोम की कुल खपत 3।5 अरब सालाना पर ले जाने का इरादा है। देश की कुल जनसंख्या में आधी आबादी और बच्चों और बूढ़ों के साथ उन लोगों की संख्या घटा दें जो अपना कंडोम खुद खरीदतें हैं, तो प्रति व्यक्ति कंडोम की खपत का रोचक आंकड़ा निकलेगा। एड्स के नाम पर हो रहे खर्च में चूंकि अस्पतालों की खास भूमिका नहीं है (क्योंकि मरीज कहां से आएंगे)। ये खर्च हो रहा है एनजीओ के माध्यम से। एड्स की जागृति फैलाने में एक लाख बीस हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप को ट्रेनिंग दी जा रही है। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एड्स के लिए पैसा आता रहे और स्वास्थ्य पर खर्च की प्राथमिकताएं न बदलें इसमें कितने लोगों का स्वार्थ जोड़ दिया गया है।संख्या का हिसाब देखें तो अभी पौने तीन लाख लोग फील्ड वर्कर के तौर पर एड्स की जागरूकता फैला रहे हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 2012 तक इनकी संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन लाख करने का इरादा है। एडस कंट्रोल कार्यक्रम से एक लाख तेरह हजार डॉक्टरों और लगभग एक लाख नर्सों को भी जोड़ा जा हा है। यानी हमारे देश में एड्स बेशक बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन ये बहुत बड़ा रोजगार जरूर है। ये सरकारी आंकड़े तो बता रहे हैं कि एड्स से मिलने वाला रोजगार बीपीओ सेक्टर के रोजगार से भी ज्यादा है।

बच्‍चे उन्‍हें बसंत बुनने में मदद देते हैं !