एक थे सेसिल रोड्स। अफ्रीका में हीरे की खानों को बड़ी युक्ति से उन्होंने कब्जा कर लिया था. उनके काम को देखते हुए एक देश का नाम रोडेशिया रखा गया था जो आजकल जिम्बाबवे के नाम से जाना जाता है. आप लोगों ने अगर हीरा कंपनी डी-बियर्स का नाम सुना हो तो यह भी जान लीजिए कि इस डी-बियर्स कंसालिडेटेड माईन्स एण्ड गोल्डफील्ड की स्थापना सेसिल रोड्स ने ही की थी. 1890 के दशक में रोड्स अमीरों के अमीर थे. उस समय उनकी आमदनी 10 लाख डॉलर यानि एक मिलियन डॉलर सालाना थी जो कि आज भी किसी अमरीकी के लिए बहुत बड़ी रकम होती है. रोड्स अमीरी के लिए पैसे नहीं कमाता था. उसका एक सपना था.उसका सपना था कि हमें कुछ ऐसी रणनीति विकसित करनी चाहिए कि दुनिया पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थायी रूप से कायम हो सके. उसका मानना था कि इसके लिए हमें बहुत लंबी रणनीति के तहत काम करना होगा. और उसने यह किया भी.उसने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति देकर लोगों को पढ़ने के लिए आमंत्रित करना शुरू किया. उसका मानना था कि दुनिया में कहीं भी प्रतिभा हो तो उसका उपयोग साम्राज्य विस्तार में करना चाहिए. उसने एक राउण्ड टेबल की स्थापना की थी जो आज भी काम कर रही है. यह राउण्ड टेबल दुनिया के वर्तमान की समीक्षा और भविष्य को तय करती है. आज दुनिया की तथाकथित बड़ी-बड़ी संस्थाएं जो दुनिया पर नियंत्रित कर रही हैं उनमें से अधिकांश राउण्ड टेबल के दिमाग की उपज हैं. राउण्ड टेबल की स्थापना के बाद रॉथचाईल्ड कारपोरेशन, कार्नेगी युनाईटेड किंगडम ट्रस्ट, रॉकफेलर फाउण्डेशन, फोर्ड फाउण्डेशन, जे पी मार्गन, हिटनी परिवार, लेजार्ड ब्रदर्स आदि महत्वपूर्ण घराने इसके सदस्य बनते चले गये. अमेरिका की प्रितिष्ठित येल यूनिवर्सीटी में एक विभाग था स्कल एण्ड बोन सोसायटी. यह सोसायटी गुप्त रूप से राउण्ड टेबल के लिए काम करती थी.रोड्स तो कब के मर गये लेकिन राउण्ड टेबल जिन्दा है.राउण्ड टेबल की कारगुजारियों और योजनाओं पर एक किताब है जिसका नाम है- द प्रिजन. इस किताब में राउण्ड टेबल का पूरा इतिहास और आगे की कारगुजारियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है. किताब बताती है कि राउण्ड टेबल दुनिया को मुट्ठी में करने के लिए युद्ध को आवश्यक हथियार मानती है. इसकी शुरूआत 1899 से होती है जब दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध की शुरूआत हुई थी. 13 साल चले इस युद्ध में अफ्रीका तबाह हुआ और वहां की प्राकृतिक संपदा अंग्रेजों के हाथ में चली गयी. वहां के लोग अपने ही देश में गुलाम बन गये. कुछ-कुछ वैसा ही जैसा हाल में ही इराक में हुआ है. पहले और दूसरे विश्वयुद्ध की व्यूह-रचना में भी इसी राउण्ड टेबल की सोच काम कर रही थी. आज राउण्ड टेबल कोई संस्था नहीं है, यह एक सोच है जो संस्थाओं को जन्म देती है. इसने बहुत सी संस्थाओं को जन्म दिया है. दुनिया की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 26 जून 1946 को जिस अधिनियम के तहत की गयी थी वह अधिनियम गोलमेज के काउंसिल आफ फारेन रिलेशन्स के तहत आता था. गोलमेज की मंशा साफ थी कि दुनिया पर नियंत्रण करना है तो ऐसी कोई संस्था होनी चाहिए जो छद्म आजादी के नाम पर हमारी योजनाओं को पूरी दुनिया में लागू करवा सके.द प्रिजन में विलियम एच मैकहनी लिखते हैं - संयुक्त राष्ट्र की योजना पूरी तरह वैश्विक नियंत्रण की है. इसके लिए यहां साम-दाम-दंड-भेद सभी नीतियों का इस्तेमाल किया जाता है. यह विश्व सरकार जीवन के हर क्षेत्र में नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण, विज्ञान और तकनीकि, स्वास्थ्य, शस्त्र और सैनिक नियंत्रण, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों के लिए नीतियां बनाती और लागू करवाती है.गोलमेज समुदाय के लोग संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से दुनिया में यह मानसिकता विकसित करना चाहते हैं कि देश के लोगों का अपने शासन-प्रशासन से धीरे-धीरे विश्वास खत्म हो जाए. (इस बात को ठीक से समझने के लिए आप संयुक्त राष्ट्र शांति सेना, संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य और शिक्षा मिशन का उदाहरण ले सकते हैं). एक बार लोगों का स्थानीय लोक प्रशासन से विश्वास उठ जाएगा तो दुनिया में एक केन्द्रीय सेना, केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय अर्थतंत्र के बारे में लोगों का विरोध समाप्त हो जाएगा.इसी सोच को पुख्ता करने के लिए विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश, एमनेस्टी इंटरनेशनल, वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन, यूनेस्को, यूएनडीपी, मानवाधिकार से जुड़े संगठन, गैर-सरकारी संगठन आदि बनाये गये हैं. आज भारत में ही विकास की कई योजनाओं पर काम करनेवाली संस्थाओं को फोर्ड फाउण्डेशन पैसा देता है. यह फोर्ड फाउण्डेशन गोलमेज समुदाय का सक्रिय सदस्य है. इस गोलमेज समुदाय का हाल के दिनों में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था गैट की स्थापना. गोलमेज समुदाय की एक संस्था बिल्डबर्ग की एक बैठक 1991 में वाडेन, जर्मनी में हुई थी. इस बैठक में डेविड रॉकफेलर, कई प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, एक अमेरिकी प्रांत के गवर्नर बिल क्लिंटन, तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश, नीदरलैण्ड की रानी बीट्रीक्स, स्पेन की रानी सोफिया, ब्रिटेन की ओर से जॉन स्मिथ आदि मौजूद थे. इसी बैठक में जार्ज बुश ने इराक के खिलाफ युद्ध का खुलासा किया था. इसके बाद निर्णय हुआ कि युद्ध के बाद वहां संयुक्त राष्ट्र सेना नियुक्त कर दी जाएगी. वहां उपस्थित सभी लोगों ने जार्ज बुश सीनियर की योजना को सही ठहराया और संयुक्त राष्ट्र से बात करने का प्रस्ताव किया. इस बैठक में और नामों के अलावा एक नाम पीटर डी सदरलैण्ड का भी था. सदरलैण्ड इस बैठक के बाद गैट के डायरेक्टर जनरल बन गये. बिल्डरबर्ग की अगली बैठक 1994 में फिनलैण्ड में हुई. गैट की सफलता को नये आयाम देने के लिए व्यापार को और प्रभावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम शुरू हुआ. 1995 में स्विटजरलैण्ड में कई गोपनीय बैठकों के बाद आखिरकार वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन का चेहरा दुनिया के सामने आ गया. आज भारत में जिस डब्ल्यूटीओ का गुणगान किया जाता है और जिसकी शर्तों की दुहाई देकर व्यापारिक नीतियों को बड़े पैमाने पर उलट-पुलट दिया गया उसके जन्म की कहानी यह है कि वह दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी मुट्ठी में लेने के लिए अस्तित्व में आया था.द प्रिजन में मैकहनी लिखते हैं - आईएमएफ की यह जिम्मेदारी है कि वह अफ्रीका, एशिया और दुनिया के दूसरे विकासशील देशों को "सभ्य" समाज में शामिल करने के लिए धन का वितरण करे.इसी रणनीति पर काम करते हुए आईएमएफ ने पूरी दुनिया के गरीब मुल्कों में घूसखोरी का सहारा लेकर वहां राजनीतिज्ञों को खरीद लिया. उसने ऐसी नीतियां बनवाने में कामयाबी हासिल कर ली कि गरीब मुल्क अपनी जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आने दें. यहां खेती की ऐसी विधि विकसित की जा रही है जो नकद आमदनी देनेवाली हो. इस पैसे से वह अपने लिए जरूरत के सभी सामान अमीर मुल्कों से आयात करेगा. इससे दोहरा फायदा है. गरीब देश केवल अमीर मुल्कों के लिए निर्यातक बनकर रह जाएंगे और इस निर्यात से जो पैसा मिलेगा उससे फिर वे उन्हीं अमीर मुल्कों से जरूरत का सामान खरीदेंगे. इस तरह अमीर मुल्क दोनों ओर से फायदे में हैं. वे बड़ी चालाकी से दुनिया की सारी प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल अपने ऐशो-आराम के लिए कर रहे हैं और गरीब मुल्कों पर उनकी संप्रभुता भी कायम है.
युगवार्ता डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम से साभार
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Saturday, April 5, 2008
Saturday, February 16, 2008
आईएमएफ और विश्वबैंक क्या हैं?
प्रस्तुति- मीनाक्षी अरोड़ा
आईएमएफ और विश्वबैंक दुनिया के सबसे अमीर जी-7 के देशों -अमरीका, ब्रिटेन,जापान,जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और इटली की सरकारों द्वारों नियंत्रित होते हैं, इन संस्थाओं के बोर्ड पर 40 फीसदी से भी ज्यादा नियंत्रण धनी देशों का ही रहता है। इनका काम तथाकथित 'तीसरी दुनिया' या ग्लोबल साऊथ के देशों और पूर्व सोवियत ब्लॉक की 'संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था' पर अपनी आर्थिक नीतियों को थोपना है।
एक बार देश इन बाहरी कंर्जो के चुंगल में फंस जाते हैं तो उन्हें फिर कहीं कोई क्रेडिट या कैश नहीं मिलता, जैसे अधिकांश अफ्रीका, एशिया, लातिन अमरीका और कैरेबियाई देश कर्जे में फंसे हैं तो वे इन्हीं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास जाने के लिये मजबूर हो गए हैं नतीजतन उन्हें वे सब शर्तें माननी पड़ती है, जो बैंक करने के लिये कहता है कोई भी देश कर्जे की समस्याओं से उबर नहीं पाया है, बल्कि बहुत से देशों की हालत तो पहले से भी बदतर हो गई है, विश्वबैंक-आईएमएफ से सहायता लेने के बाद तो कर्ज और भी बढ़ गया है।
ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप- स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट प्रोग्राम)आईएमएफ-विश्वबैंक की शर्तों को ही ''ढांचागत समायोजन कार्यक्रम'' के नाम से जाना जाता है (हालांकि ये संस्थाएं इस शब्द की नकारात्मक स्थिति से बचने की कोशिश में लगे हैं, इसलिये इसका नाम बदलकर 'गरीबी घटाने और विकास का कार्यक्रम' किया गया है!) यह कार्यक्रम देशों को मजबूर करता है कि वे धनी देशों को निर्यात करें और ऊंचे मुनाफे वाले विदेशी निवेश करने की सुविधा दें। अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ोतरी यानी कारपोरेट ग्लोबलाइजेशल में 1980 के दशक में ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों को थोपने की प्रवृत्ति अपनाई गई क्योंकि कम्पनियां और निवेशकों ने अपने अधिकारों और सुरक्षा की मांग की, उनको सरकारों द्वारा सम्पत्ति के जब्त होता या नए नियमों के लादे जाने का खतरा महसूस हो रहा था। इन मांगों के जवाब में ही 1995, में डब्ल्यूटीओ की स्थापना की गई, यह एक ऐसी संस्था है। जिसकी गुप्त एजेंसिया, कंपनियों के अधिकारों के रास्ते में आने वाले हर राष्ट्रीय कानून को गैरकानूनी या निरस्त घोषित कर देती हैं।
सर्वोत्त्तम रूप में विश्वबैंक को एक ऐसी संस्था के रूप में जाना जाता है जो आर्थिक विकास में सहायक बड़ी परियाजनाओं जैसे- बांधों, सड़कों और पावर प्लांटों आदि के लिये वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती हैं। लेकिल जो प्राय: पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक भटकाव से भी सम्बन्धित है। आईएमएफ और इसकी अधिकांश सहायता उन कार्यक्रमों को जाती हैं जिनमें 'सुधार' के नाम पर आर्थिक नीतियों द्वारा गरीबों का गला घोंटकर कम्पनियों को लूट के लिये छूट दी जाती है। हालांकि पूर्वी एशिया में आए आर्थिक संकट के कारण आईएमएफ की काफी-कुछ आलोचना हुई है(इसने दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड पर अपने विकास कार्यक्रम लाद दिये थे) ज्यादा नुकसान अर्जेंटीना में हुआ, फिर भी दोनों संस्थाएं पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर काबिज होने के लिये लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को राजनीतिक और व्यवसायिक एलीट वर्ग के जरिये, नियंत्रित करने में जुटी हुई हैं।
ये देश इनकी नीतियां अपनाने के लिये मजबूर हैं खासतौर पर लोक कल्याणकारी कार्यों में राज्य की भूमिका कम करने और नियमों को हटाने के लिये बाध्य हैं। इन नीतियों को शुरू करने के साथ ही कमजोर देशों पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगे। ''बाजार की सफलता'' की जो कहानियां हमने पढ़ीं कि ये पूंजी पैदा करते हैं, वह तो जनसंख्या के एक छोटे से भाग को ही जाती है और उसमें से भी गरीबी की मार झेल रही हैं, बुनियादी सेवाएं तक उन्हें नहीं मिल पाती, अपनी ही अर्थव्यवस्थाओं पर उनका नियंत्रण खोता जा रहा है।‘सैप’ कारपोरेट और एलीट के लिये काम करता है:आईएमएफ और विश्वबैंक द्वारा बनाए गए ढ़ांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) क्यों और कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुविधा के लिये आवश्यक ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जिन्होंने दक्षिणी के देशों के ज्यादातर लोगों को उजाड़ दिया है? सैप की परिस्थितियों पर एक नजर डालें तो मालूम होगा कि एक बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर धन्नासेठों के हितों का पोषण करने के लिये कैसे आर्थिक 'सलाह' का इस्तेमाल किया जाता है।
सैप के लिये देश हामी क्यों भरते हैं?सैप कई रूपों में प्रजातंत्र -विरोधी हैं। संस्थाएं ठीक ही कहती हैं कि सरकारें इन योजनाओं से सहमत हैं। लेकिन इन योजनाओं में शामिल सरकारी अधिकारी आमतौर पर वित्त मंत्रालय और केन्द्रीय बैंक तक ही सीमित हैं जो रूढ़िवादी, उत्तर में शिक्षित और सरकार के सबसे धनी सदस्यों में से होते हैं- यानी दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें से अधिकांश आईएमएफ की आर्थिक नीतियों से सहमत और लाभाविन्त ही होते हैं। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने वाले आधिकारियों का नजरिया चाहे कुछ भी हो, लेकिन इन सबसे बाध्यता जरूर होती है। शक्ति समीकरण बहुत सरल है: अगर कर्जदार देश ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) योजना से सहमत नहीं है, तो इसे 'ग्लोबल इकॅनोमी ' से अलग कर दिया जाएगा – क्रेडिट (साख), सहायता, कर्ज सब कुछ बंद कर दिया जाएगा- फिर भी दूसरे अन्य कई कर्जदार आईएमएफ और विश्वबैंक का नेतृत्व स्वीकारने की लाइन में लगे हैं।
''शॉर्ट टर्म पेन फॉर लोंग टर्म गेन'' का नारा खोखला लगता है, जब इसे सारी पीढ़ीयों के लिये कहा जाता है। ऐसी बेकार नीतियों के साथ कोई विरली सरकार ही अपने लोगों को ढांचागत समायोजन कार्यक्रम देना चाहेगी, खासतौर पर तब जबकि 25 साल के लम्बे समय में हम देख चुके हैं कि थोड़े समय की यह पीड़ा कभी खत्म नहीं होती और लाभ तो कभी शुरू ही नहीं होते। सैप प्रजातान्त्रिक देशों की प्रतिनिधि सरकारों को ऐसे मानक अपनाने को मजबुर कर अस्थायित्व पैदा कर देते हैं जिससे जनता में सरकार की वैधता कम हो जाए। ऐसा भी तर्क दिया गया है कि आईएमएफ प्रजातान्त्रिक देशों में तानाशाही पसंद करता है क्योंकि तानाशाह सैप को ज्यादा सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं और एक बार नियम लागू हो गए तो डब्ल्यूटीओ प्रजातंत्र पर प्रहार करता है इसके लिये वह कम्पनियों के मुनाफे के अधिकार के रास्ते में आने वाले हर नियम को निरस्त करवा देता है।
यह सच है कि वाशिंगटन में स्थित ये संस्थाएं जो अमरीकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट द्वारा नियंत्रित होती हैं पिछले दो दशकों से दुनिया की बहुसंख्यक आबादी को भूखा मार रही हैं। अमरीका के लोग इस सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ हैं कि यह अब एक कलंक बन गई है। यह व्यवस्था उनके लिये अच्छी है जिन्हें इससे मुनाफा हो रहा है।
दुनिया में कहीं भी रहने वाले व्यक्ति को यह जानने के लिये कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है, पचास सालों का समय बहुत होता है। इस व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर हम व्यवस्था को बदल सकते हैं जो अमीर को और ज्यादा अमीर बना रहा है और उजड़े और कमजोर को और ज्यादा मार रहा है।
पीएनएन हिन्दी से साभार
आईएमएफ और विश्वबैंक दुनिया के सबसे अमीर जी-7 के देशों -अमरीका, ब्रिटेन,जापान,जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और इटली की सरकारों द्वारों नियंत्रित होते हैं, इन संस्थाओं के बोर्ड पर 40 फीसदी से भी ज्यादा नियंत्रण धनी देशों का ही रहता है। इनका काम तथाकथित 'तीसरी दुनिया' या ग्लोबल साऊथ के देशों और पूर्व सोवियत ब्लॉक की 'संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था' पर अपनी आर्थिक नीतियों को थोपना है।
एक बार देश इन बाहरी कंर्जो के चुंगल में फंस जाते हैं तो उन्हें फिर कहीं कोई क्रेडिट या कैश नहीं मिलता, जैसे अधिकांश अफ्रीका, एशिया, लातिन अमरीका और कैरेबियाई देश कर्जे में फंसे हैं तो वे इन्हीं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास जाने के लिये मजबूर हो गए हैं नतीजतन उन्हें वे सब शर्तें माननी पड़ती है, जो बैंक करने के लिये कहता है कोई भी देश कर्जे की समस्याओं से उबर नहीं पाया है, बल्कि बहुत से देशों की हालत तो पहले से भी बदतर हो गई है, विश्वबैंक-आईएमएफ से सहायता लेने के बाद तो कर्ज और भी बढ़ गया है।
ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप- स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट प्रोग्राम)आईएमएफ-विश्वबैंक की शर्तों को ही ''ढांचागत समायोजन कार्यक्रम'' के नाम से जाना जाता है (हालांकि ये संस्थाएं इस शब्द की नकारात्मक स्थिति से बचने की कोशिश में लगे हैं, इसलिये इसका नाम बदलकर 'गरीबी घटाने और विकास का कार्यक्रम' किया गया है!) यह कार्यक्रम देशों को मजबूर करता है कि वे धनी देशों को निर्यात करें और ऊंचे मुनाफे वाले विदेशी निवेश करने की सुविधा दें। अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ोतरी यानी कारपोरेट ग्लोबलाइजेशल में 1980 के दशक में ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों को थोपने की प्रवृत्ति अपनाई गई क्योंकि कम्पनियां और निवेशकों ने अपने अधिकारों और सुरक्षा की मांग की, उनको सरकारों द्वारा सम्पत्ति के जब्त होता या नए नियमों के लादे जाने का खतरा महसूस हो रहा था। इन मांगों के जवाब में ही 1995, में डब्ल्यूटीओ की स्थापना की गई, यह एक ऐसी संस्था है। जिसकी गुप्त एजेंसिया, कंपनियों के अधिकारों के रास्ते में आने वाले हर राष्ट्रीय कानून को गैरकानूनी या निरस्त घोषित कर देती हैं।
सर्वोत्त्तम रूप में विश्वबैंक को एक ऐसी संस्था के रूप में जाना जाता है जो आर्थिक विकास में सहायक बड़ी परियाजनाओं जैसे- बांधों, सड़कों और पावर प्लांटों आदि के लिये वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती हैं। लेकिल जो प्राय: पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक भटकाव से भी सम्बन्धित है। आईएमएफ और इसकी अधिकांश सहायता उन कार्यक्रमों को जाती हैं जिनमें 'सुधार' के नाम पर आर्थिक नीतियों द्वारा गरीबों का गला घोंटकर कम्पनियों को लूट के लिये छूट दी जाती है। हालांकि पूर्वी एशिया में आए आर्थिक संकट के कारण आईएमएफ की काफी-कुछ आलोचना हुई है(इसने दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड पर अपने विकास कार्यक्रम लाद दिये थे) ज्यादा नुकसान अर्जेंटीना में हुआ, फिर भी दोनों संस्थाएं पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर काबिज होने के लिये लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को राजनीतिक और व्यवसायिक एलीट वर्ग के जरिये, नियंत्रित करने में जुटी हुई हैं।
ये देश इनकी नीतियां अपनाने के लिये मजबूर हैं खासतौर पर लोक कल्याणकारी कार्यों में राज्य की भूमिका कम करने और नियमों को हटाने के लिये बाध्य हैं। इन नीतियों को शुरू करने के साथ ही कमजोर देशों पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगे। ''बाजार की सफलता'' की जो कहानियां हमने पढ़ीं कि ये पूंजी पैदा करते हैं, वह तो जनसंख्या के एक छोटे से भाग को ही जाती है और उसमें से भी गरीबी की मार झेल रही हैं, बुनियादी सेवाएं तक उन्हें नहीं मिल पाती, अपनी ही अर्थव्यवस्थाओं पर उनका नियंत्रण खोता जा रहा है।‘सैप’ कारपोरेट और एलीट के लिये काम करता है:आईएमएफ और विश्वबैंक द्वारा बनाए गए ढ़ांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) क्यों और कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुविधा के लिये आवश्यक ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जिन्होंने दक्षिणी के देशों के ज्यादातर लोगों को उजाड़ दिया है? सैप की परिस्थितियों पर एक नजर डालें तो मालूम होगा कि एक बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर धन्नासेठों के हितों का पोषण करने के लिये कैसे आर्थिक 'सलाह' का इस्तेमाल किया जाता है।
सैप के लिये देश हामी क्यों भरते हैं?सैप कई रूपों में प्रजातंत्र -विरोधी हैं। संस्थाएं ठीक ही कहती हैं कि सरकारें इन योजनाओं से सहमत हैं। लेकिन इन योजनाओं में शामिल सरकारी अधिकारी आमतौर पर वित्त मंत्रालय और केन्द्रीय बैंक तक ही सीमित हैं जो रूढ़िवादी, उत्तर में शिक्षित और सरकार के सबसे धनी सदस्यों में से होते हैं- यानी दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें से अधिकांश आईएमएफ की आर्थिक नीतियों से सहमत और लाभाविन्त ही होते हैं। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने वाले आधिकारियों का नजरिया चाहे कुछ भी हो, लेकिन इन सबसे बाध्यता जरूर होती है। शक्ति समीकरण बहुत सरल है: अगर कर्जदार देश ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) योजना से सहमत नहीं है, तो इसे 'ग्लोबल इकॅनोमी ' से अलग कर दिया जाएगा – क्रेडिट (साख), सहायता, कर्ज सब कुछ बंद कर दिया जाएगा- फिर भी दूसरे अन्य कई कर्जदार आईएमएफ और विश्वबैंक का नेतृत्व स्वीकारने की लाइन में लगे हैं।
''शॉर्ट टर्म पेन फॉर लोंग टर्म गेन'' का नारा खोखला लगता है, जब इसे सारी पीढ़ीयों के लिये कहा जाता है। ऐसी बेकार नीतियों के साथ कोई विरली सरकार ही अपने लोगों को ढांचागत समायोजन कार्यक्रम देना चाहेगी, खासतौर पर तब जबकि 25 साल के लम्बे समय में हम देख चुके हैं कि थोड़े समय की यह पीड़ा कभी खत्म नहीं होती और लाभ तो कभी शुरू ही नहीं होते। सैप प्रजातान्त्रिक देशों की प्रतिनिधि सरकारों को ऐसे मानक अपनाने को मजबुर कर अस्थायित्व पैदा कर देते हैं जिससे जनता में सरकार की वैधता कम हो जाए। ऐसा भी तर्क दिया गया है कि आईएमएफ प्रजातान्त्रिक देशों में तानाशाही पसंद करता है क्योंकि तानाशाह सैप को ज्यादा सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं और एक बार नियम लागू हो गए तो डब्ल्यूटीओ प्रजातंत्र पर प्रहार करता है इसके लिये वह कम्पनियों के मुनाफे के अधिकार के रास्ते में आने वाले हर नियम को निरस्त करवा देता है।
यह सच है कि वाशिंगटन में स्थित ये संस्थाएं जो अमरीकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट द्वारा नियंत्रित होती हैं पिछले दो दशकों से दुनिया की बहुसंख्यक आबादी को भूखा मार रही हैं। अमरीका के लोग इस सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ हैं कि यह अब एक कलंक बन गई है। यह व्यवस्था उनके लिये अच्छी है जिन्हें इससे मुनाफा हो रहा है।
दुनिया में कहीं भी रहने वाले व्यक्ति को यह जानने के लिये कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है, पचास सालों का समय बहुत होता है। इस व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर हम व्यवस्था को बदल सकते हैं जो अमीर को और ज्यादा अमीर बना रहा है और उजड़े और कमजोर को और ज्यादा मार रहा है।
पीएनएन हिन्दी से साभार
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